पहला भ्रम – अध्यात्म
मानो या न मानो भ्रम को पहचानो
मुख्य विचार का पूर्वाभास
अपने विषय में ज्ञान केवल विज्ञान की विषयवस्तु है। इस सम्बन्ध में सबसे पहला लिखित रूप में उपलब्ध वैज्ञानिक ज्ञान पुरातन भारत की ज्ञान की पुस्तकों वेदों में विस्तार से निहित है। इन पुस्तकों के रचयिता अत्यधिक विनम्रता से बार बार इस विचार पर बल देते हैं कि उन्होंने बहुत थोड़ा ही आत्म ज्ञान के विषय में मालूम किया है और कितना भी क्यों न मालूम कर लिया जाए वह थोड़ा ही रहेगा क्योंकि यह ज्ञान असीमित है और इसी कारण मनुष्य जीवन का उद्देश्य केवल इसी को मालूम करना ही होना चाहिए। परन्तु दूसरी ओर अध्यात्म के गलत अंग्रेजी अनुवाद SPIRITUALISM की विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक्ताओं के ठेकेदार इसके ठीक विपरीत इस विचार पर ऐसे काल्पनिक, भ्रमात्मक, अवैज्ञानिक तथा एक दूसरे के विरोधी तर्कों पर बल देते हैं कि जैसे केवल उनके द्वारा प्रतिपादित अध्यात्म ने ही आत्मज्ञान के सारे पहलुओं को अंतिम रूप से समझ और जान लिया है। इस भ्रम को फैलाने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार के हथकंडों का प्रयोग किया जाता है। कैसे ? यह जानने के लिए पढ़ते रहें, पढ़ते रहें और मानवता को इन धोखों से बचाने में सहायता करें।
क्यों फल फूल रहा है भ्रमात्मक अध्यात्म का पाखंड?
अध्यात्म पर काफी बड़ी जनसँख्या रोज़ी रोटी के लिए निर्भर है और कुछ के लिए तो यह एक बहुत बड़ा आश्चर्य से भरा व्यापार है। यह तभी संभव है जब एक बहुत बड़ी जनसँख्या इस की पक्षधर हो। और यह है भी। भारत की तो यह ऐसी व्यापारिक वस्तु है कि इसका बार बार सफलतापूर्वक निर्यात किया गया है। इसी कारण एक आम भारतीय इस भ्रम में पला बड़ा है कि भारत विश्व गुरु रहा है। क्या एक बहुत बड़ी संख्या का किसी बात का पक्षधर होना पर्याप्त प्रमाण है कि यह विचार पाखंड भरा भ्रम नहीं हो सकता ? संभवतः इसके विपरीत इस सम्भावना को तो झुटलाया नहीं जा सकता कि किसी विचार ने केवल पाखंडों का सहारा ले कर ही किसी भ्रम को बहुमत तक फैला दिया हो।
भ्रम तथा ज्ञान की तुलना
आगे बढ़ने से पहले मैं फिर एक बार भ्रम तथा ज्ञान का तुलनात्मक अध्ययन कर इनके अंतर को निम्न रूप से स्पष्ट करना चाहूँगा
• ज्ञान हमारे अन्दर बाहर चारों ओर हमेशा से विद्यमान था,है और रहेगा। इसको कभी कभी अकस्मात अथवा सर्वदा पुरुषार्थ करके ही जाना जाता है। इसको केवल देखा, समझा,प्रयोग करके निष्कर्ष द्वारा जाना जा सकता है। हम सब दिन रात यही करके इसको आपस में बाँट कर अपनी जानकारी को बढ़ा रहें हैं। इस से केवल यह सिद्ध होता है कि हम इस के विषय में बहुत ही थोडा सा जानते हैं क्योंकि यह अत्यंत विशाल है। यह ज्ञान व्याख्या से परे है।
• दूसरी ओर भ्रम कभी भी विद्यमान नहीं होता। इसको अतार्किक कल्पना या कुतार्किक विश्लेषण से इस प्रकार पैदा कर दिया जाता है कि इसके विद्यमान होने का आभास होने लगता है। जब कभी भी, जहाँ कहीं भी एक अविद्यमान वस्तु को किसी भी प्रकार के जोड़ तोड़ से विद्यमान होने का आभास कराया जाता है वह भ्रम के अंतर्गत आता है। वेदों में तथा पतंजलि योग शास्त्र में इसे अविद्या कहा गया है और मैं इसे पाखंड भरी धूर्तता कहता हूँ ।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या अध्यात्म जो एक अविद्यमान विचार है उसको किसी प्रकार के बौद्धिक जोड़ तोड़ से एक ज्ञान के रूप में प्रकट किया गया है? इसका उत्तर हाँ में है। अध्यात्म किसी भी प्रकार से ज्ञान है ही नहीं। यह केवल भ्रम के ही रूप में विद्यमान है। वह ज्ञान जिसे वेदों के रचियताओं ने अथक परिश्रम से लिपिबद्ध किया, उसी को जोड़ तोड़ कर अध्यात्म का नाम दे दिया गया। अध्यात्म का शाब्दिक अर्थ है ' अपने विषय में ज्ञान का अध्ययन ' और इसका अंग्रेजी अनुवाद कर दिया गया 'स्पिरिचुअलिज्म'। यह सब भारत में ही प्रारंभ हुआ और अब सारे संसार में इसी अर्थ में समझा जाता है। कैसे हुआ यह सब? जानने के लिए पढ़ते रहिये और यह जान कर बिलकुल भी आश्चर्य चकित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वैदिक ज्ञान के आधार पर यह बात निश्चय पूर्वक कही जा सकती है कि मनुष्य जाति स्वभाववश ही भ्रमों में विश्वास करने कि अवस्था से गुज़रती है । मैंने इस विचार की ओर अपने पहले ही लेख "योग ज्योति - मानो या न मानो - भ्रम को पहचानो" में संकेत दिया है और मैं इसकी चर्चा समय समय पर उपयुक्त स्थान पर करता रहूँगा ।
SPIRITUALISM जैसा अंग्रेजी में समझा जाता है
Spiritualism के सम्बन्ध में बड़ी आश्चर्यजनक बातें हुई हैं। Spiritualism को संस्कृत के शब्द अध्यात्म का अंग्रेजी अनुवाद समझा जाता है। अध्यात्म का शाब्दिक अर्थ है ' आत्म का अध्ययन ' और spiritualism का यह अनुवाद किसी भी प्रकार की कल्पना से हो ही नहीं सकता। सच्चाई तो यह है कि इस संस्कृत के शब्द का अंग्रेजी भाषा में कोई समानार्थक शब्द है ही नहीं। इसी कारण अंग्रेजी भाषी संसार में spiritualism के भिन्न भिन्न अर्थ समझे जाते हैं । पहला समूह उन विचारकों का है जो मूलतः पश्चिमी हैं और जिन्होंने संस्कृत शब्द अध्यात्म के संपर्क में आकर उसका अंग्रेजी शब्द spiritualism को ही पर्यायवाची मान कर प्रसारित किया अथवा नगण्य ज्ञान मानकर अनदेखा कर दिया । इसके दो ही कारण हो सकते हैं । एक तो यह कि अंग्रेजी में यह शब्द क्रिश्चियन मिस्टिसिज्म (Christian mysticism) के रूप में भी समझा जाता है और दूसरा इन विचारकों को शायद अध्यात्म के विषय में ऐसा ही समझाया गया। दोनों ही स्थितियों में अध्यात्म का शाब्दिक अर्थ भी नहीं समझा जा सका । इसी श्रेणी में भारतीय मूल के वे मनीषी भी आते हैं जिन्हें संस्कृत के शब्द अध्यात्म का ज्ञान अंग्रेजी की खिड़की के द्वारा हुआ । ये भी इस विचार को एक तरह से अविज्ञान ही मानते हैं। दूसरा समूह उन लोगों का है जो मूलतः अंग्रेजी भाषी हैं। उनकी दृष्टि में spiritualism एक भूत प्रेतों से सम्बंधित विद्या है जिसमें भूतों से बात करने की कला का विवरण है। क्या यह विद्या ज्ञान की श्रेणी में रखी जा सकती है? इस सम्बन्ध में तो संदेहों की कमी नहीं है। ऐसे ही किसी समय में चर्च ने धर्म और आत्मा के विचारों को spiritualism के साथ जोड़ दिया और ब्रिटिश पार्लियामेंट में अपने लिए लॉर्ड स्पिरिचुअल Lord Spiritual के रूप में स्थान सुरक्षित करा लिए। ईसाई संसार के बहुत सारे मत मतान्तरों ने तो अब एक दूसरे से होड़ सी लगा दी केवल यह सिद्ध करने के लिए कि उनके द्वारा ही spiritualism की दी गयी व्याख्या ही असली वोइस ऑफ़ गौड़ (Voice of God) यानी बाइबिल की सही व्याख्या है ।भारत में भी ठीक कुछ इसी प्रकार का हुआ । यहाँ एक रोचक तथ्य का ज़िक्र करना अप्रसांगिक नहीं होगा । Lord Spiritual शब्द तो चर्च द्वारा अपने स्वार्थ के लिए घड़ा गया, ठीक इस से मिलता जुलता शब्द यु एस ए (USA) में मिलता है 'नीग्रो स्पिरिचुअल' (Negro Spiritual) जहाँ स्पिरिचुअल का अर्थ चर्च में नीग्रो जाति द्वारा गाए गए गानों से है। उपर्युक्त तथ्य यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि अंग्रेजी शब्द spiritualism एक काल्पनिक तथा मनगढ़ंत शब्द है जिसका संस्कृत शब्द अध्यात्म से कोई लेना देना नहीं है । एक अविद्यमान विचार को विद्यमान ज्ञान सिद्ध करने के लिए ही एक परिष्कृत कुतर्की शब्द की रचना कर दी गई है । अंग्रेजी भाषा में अध्यात्म का यह एक झूठा, धोके भरा मिलावटी रूपांतरण है।
अध्यात्म जैसे संस्कृत में समझा जाता है
जैसा पहले कहा गया है कि अध्यात्म का शाब्दिक अर्थ है 'आत्म का अध्ययन'।यह एक सर्व विदित तथ्य है कि अध्यात्म का विचार और इसकी विषयवस्तु उपनिषद काल की देन हैं । उपनिषदों का प्रारंभिक उद्देश्य तो वेदों में निहित ज्ञान की व्याख्या करना था परन्तु कालांतर में इनके लेखकों तथा अनुयायियों ने उपनिषदों को न केवल आधिकारिक व्याख्या के रूप में प्रसारित किया अपितु इनको वेदों के समकक्ष ज्ञान की श्रेणी में प्रस्तुत किया। परिणाम स्वरुप संस्कृत का शब्द अध्यात्म अंग्रेजी शब्द spiritualism की भांति न केवल एक काल्पनिक विचार के रूप में उभरा अपितु भारत में तो अधिकतर भयानक त्रासदियों के लिए भी कुटिल उत्तरदायित्त्व का भागी बन गया। अंग्रेजी शब्द spiritualism तो केवल भ्रान्ति का शिकार होकर रह गया परन्तु संस्कृत अध्यात्म ने तो भ्रान्ति का वह रूप लिया कि जो कोई भी इसके संपर्क में आया वह यह भी न जान सका कि कितने अक्षम्य लाइलाज रूप से उसे खोखला कर दिया गया है।
उपर्युक्त सन्दर्भ में उपनिषदों के दो उल्लेख ध्यान देने योग्य हैं जो निर्विवाद सिद्ध करते हैं कि संस्कृत अध्यात्म एक काल्पनिक सिद्धांत के रूप में किस प्रकार उभरा। दोनों उपनिषद वेदों की आधिकारिक व्याख्या के रूप में जाने जाते हैं। छान्दोग्य उपनिषद ( ७-१) और मुण्डक उपनिषद (१.१.३) में इस तथ्य के स्पष्ट विवरण हैं कि अध्यात्म वेदों की विषयवस्तु नहीं है । छान्दोग्य उपनिषद में नारद ऋषि अपने गुरु सनत कुमार के समक्ष यों कहते हैं कि उसने सारे वेद, उपवेद पढ़ लिए हैं और इस प्रकार वह भौतिक विज्ञानं का तो ज्ञाता हो गया है परन्तु आत्म ज्ञान के विषय में कुछ नहीं जान पाया है। “सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मवित”। इसी प्रकार मुण्डक उपनिषद में शौनक ऋषि अपने गुरु अंगिरस से प्रार्थना करते हैं कि वे उसे आत्म ज्ञान जिसे वह परा विद्या कहता है के विषय में बताएँ क्योंकि उसे सारे वेद तथा वेदांग पढने के पश्चात् अपरा विद्या अर्थात भौतिक विद्या का तो ज्ञान हो गया है । क्या यह आश्चर्यजनक बात नहीं है कि दोनों विद्वान ऋषि अपने अपने गुरुओं के सामने वेदों में आत्मज्ञान के विषय को ही नकार देते हैं जबकि वेदों कि चार मुख्य विषयवस्तुओं में से तीन तो केवल आत्मज्ञान से ही सम्बंधित हैं? क्या यह जान बूझ कर दिखाई गई योजनाबद्ध अनभिज्ञता है ? अंग्रेजी शब्द spiritualism को तो अपने विषय में अध्ययन के साथ जोड़ने की आश्चर्य भरी कोशिशों का तो मैं पहले विवेचन कर चुका हूँ पर संस्कृत शब्द अध्यात्म को किस ढंग से वेदों के आत्मज्ञान से जोड़ा यह कम आश्चर्यजनक नहीं है । यह प्रक्रिया कुछ निम्न प्रकार से हुई है :
• अध्यात्म यदि आत्म के विषय में अध्ययन है तो 'आत्म' कोई पहले से विद्यमान विचार होना चाहिए जिसका अध्ययन करके व्याख्या की जा सके । पर अध्यात्म के जनक शब्द में छुपे आत्म को एक ओर तो वेदों में वर्णित आत्मज्ञान के आत्म से अलग मानते हैं और दूसरी ओर वेदों की संतुति भी चाहते हैं । इसलिए केवल शब्द की समानता का लाभ उठा कर इसे वेदों से प्रमाणित बता कर एक भ्रमात्मक स्तिथि को उत्पन्न कर देते हैं । जबकि अध्यात्म और वेदों के आत्मज्ञान की विषयवस्तुओं में कहीं भी मेल नहीं है।
• अध्यात्म के रचयिता इस वैदिक सिद्धांत को भलीभांति जानते हैं कि ज्ञान कि व्याख्या नहीं कि जा सकती। केवल भ्रम को ही व्याख्यातित किया जाता है। अतः वे अपने व्याख्यातित अध्यात्म को मूल ज्ञान सिद्ध करने के लिए तथा वेदों से प्रमाणित सिद्ध करने के लिए एडी चोटी का जोर लगा देते हैं और इसे वेदों में वर्णित मनुष्य का धर्म “ज्ञान कि दिशा में किया गया अथक एवं अवर्णनीय प्रयत्न” बताते है। जबकि वेदों के इस निर्देश को सहज ही भुला देते हैं कि यह तो अविद्या की दिशा में उठाया गया ऐसा कदम है जिसके परिणाम केवल विनाशकारी हैं ।
• इस छद्म ज्ञान के लिए वेदों की संतुति चाहने का एक बहुत पुराना समयसिद्ध सिद्धांत भी है। यह एक ऐसा सिद्धांत है जिसकी अवहेलना कोई भी भ्रम फ़ैलाने वाला व्यक्ति कभी भी नहीं कर सकता । और वह है बहुमत द्वारा स्वीकार्यता। संभवतः वेदों की अपौरुषेयता या ज्ञान के प्रकटीकरण का विचार जोकि दोनों सफ़ेद झूठ की श्रेणी में आते हैं, उपनिषद लिखे जाने के काल में इतनी स्वीकार्यता प्राप्त कर चुके थे कि अध्यात्म के रचियताओं को वेदों का सहारा लेने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था ।
स्वीकार्यता को ही प्राप्त करने के लिए अध्यात्म के इन अविष्कारकों ने वेदों के आत्म ज्ञान के भाग से ही छेड़ छाड़ नहीं की बल्कि वेदों के शेष तीन भागों को भी नहीं छोड़ा क्योंकि स्वीकार्यता एक ऐसा अस्त्र है जो कुछ गिने चुने लोगों के हाथ में तो अपार शक्ति और धन धान्य को थमा देता है और बहु संख्यकों को लाचारी, विपत्ति और भय से भर देता है । वेदों के बचे तीन भाग अर्थात ब्रह्मज्ञान , यज्ञ विधान , धार्मिक विधान या व्यवहारिक नैतिकता भी इन अध्यात्मवादियों के शिकार होने से नहीं बच सके । इसी श्रृंखला में समय आने पर मैं इनका वर्णन करूँगा । अभी तो केवल आत्म ज्ञान से सम्बंधित उन हथकंडों का ही वर्णन करूँगा जिनसे आत्म ज्ञान में निहित आत्म शब्द को अध्यात्म के विद्या आडम्बरी तथा पांडित्य प्रदर्शनकारी शब्दों के द्वारा तोडा मरोड़ा गया । पर उस से पहले आवश्यक है वेदों में आत्म ज्ञान से सम्बंधित धारणाओं को जान लेना ।
वेदों में आत्म ज्ञान के विभिन्न पहलू
वेदों में आत्मज्ञान के अनेक पहलूओं पर विचार किया गया है। वैदिक मनीषियों का यह निश्चित मत है कि यह जो कुछ भी मालूम किया जा सका है वह बहुत ही अल्प है क्योंकि ज्ञान असीमित "नेति नेति" है । कुछ पहलू निम्नलिखित हैं:-
• आत्म का मूल - इसकी उत्पत्ति, पदार्थ एवं ऊर्जा के सिद्धांत व गुण
• सृष्टि के परिपेक्ष में आत्म का मूल - वातावरण से इसका सम्बन्ध, इसकी रचना को प्रभावित करने वाले तत्त्व, सृष्टि का निरंतर, अविनाशी व पूर्ण होने के सिद्धांत
• आत्म का बाह्य स्वरुप - इसकी जैविक, रासायनिक एवं भौतिक संरचना
• आत्म का आन्तरिक स्वरुप - इसकी सूक्ष्म संरचना एवं गुणों की व्याख्या जिसके अंतर्गत मानसिक, मनोवैज्ञानिक तथा व्यवहारिक गुणसूत्रों कि व्याख्या स्मृति, वृत्ति, संस्कार आदि के रूप में की गई है
• आत्म के अस्तित्व, संयोजन एवं क्रियाशीलता के सिद्धांत
• आत्म की क्षमताएं - ब्रह्मज्ञान में निहित वृत्तियों को आत्म में आन्तरिक स्वरुप में स्तिथ चित्त नाम के उपकरण की सहायता से समझना व इनका उपयोग करना
• आत्म का विकास - योग पद्धति द्वारा
उपर्युक्त सूची पूर्ण नहीं है क्योंकि मैं वेदों का विद्वान नहीं हूँ। पर यह अधूरी सूची यह सिद्ध करने के लिए तो पर्याप्त है कि वेदों में आत्म ज्ञान की तो भरमार है। यही नहीं वैदिक मनीषियों का तो यह निष्कर्ष है कि यदि ब्रह्माण्ड को जानना हो तो आत्म को जानो क्योंकि "यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे"। फिर भी उपर्युक्त उपनिषदों में विद्वान ऋषियों ने अपने गुरुओं के समक्ष वेदों में आत्म की उपस्तिथि से अनभिज्ञता प्रकट की । कारण स्पष्ट है कि वे जान बूझ कर अध्यात्म के ढोंग को उत्पन्न करने की अपने गुरुओं कि योजना में भागीदार बनना चाहते थे । निश्चित ही अध्यात्म केवल एक ढोंग ही प्रतीत होता है ।
अतार्किक विश्लेषण की प्रक्रिया
वेदों की ही यह खोज तथा निर्देश है कि कोई भी व्यक्ति जब चाहे योग की विधि द्वारा अपने शारीर में स्तिथ चित्त नामक उपकरण से किसी भी भ्रम की अवस्थाओं से निकल सकता है । यही संक्षेप में वेदों का आत्मज्ञान है जिसे समझ कर पता नहीं कितने मनीषियों ने वेदों की रचना की और सारे संसार के इतिहासों में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं है जिन्होंने वेदों में निहित योग के ज्ञान को जाने बिना ही ज्ञान की अमूल्य निधियों को मनुष्य जाति के सम्मुख प्रस्तुत किया और दिन रात इसी प्रयास में लगे हैं । यह तभी संभव है जब किसी का चित्त किसी भी भ्रमात्मक विचार का कैसी भी परिकूल या लुभावनी परिस्तिथियों में शिकार होने से मना कर दे । और चित्त कोई कल्पना नहीं है, यह तो वैदिक विचार के अनुसार हर मनुष्य का एक ठोस अंग है। परन्तु अध्यात्म के मनीषियों ने अध्यात्म के छद्म विचार को ही अपने ही द्वारा कल्पित एक ऐसी वेदों द्वारा दी गई संतुति से मढ़ दिया कि आज वेदों के उक्त निर्देश का पालन तो अलग, किसी ऐसे विचार पर जो अध्यात्म द्वारा मान्य नहीं है उस पर विचार करना भी एक दुस्साहस समझा जाता है । भारत में तो इसके परिणाम इतने भयानक एवं दुखदाई हुए कि दासता के कष्ट तो सहने ही पड़े इसके अतिरिक्त हम ऐसी मानसिकता के शिकार हो गए जो हर क्षेत्र में किसी भी प्रकार की उन्नत्ति की राह में धर्म व आस्था की दुहाई देकर रोड़े अटकाने को ही श्रेयष्कर मानने लगी उन्नत्ति उन्मुख होने के लिए मानव समाज की आज यह सबसे बड़ी ज़रुरत है कि इस मानसिकता से निकला जाए । यह पतंजलि योग में बताई विधि से संभव भी है। तो क्यों नहीं सच्चे अर्थों में विश्व गुरु बनने कि दिशा में कदम उठाए जाएँ । पर उसके पहले यह पता लगाना आवश्यक है कि कैसे उत्पन्न हुई यह स्तिथि ? इस प्रक्रिया को समझने में निम्न विचार सहायक हो सकते हैं:-
• आत्म ज्ञान और अध्यात्म को साथ साथ रखना
• प्रचलित शब्दों के साथ खिलवाड़ तथा नए शब्दों की रचना करना
• आत्मा के विचार की रचना करना
• वैदिक आत्म ज्ञान के पहलूओं के साथ छेड़ छाड़ करना
• वैदिक सिद्धांत “ज्ञान की अक्षुणता” को सीमित करना
• वेदों से सम्बंधित दर्शनों के साथ कांट छांट करना विशेषतया पतंजलि योग शास्त्र के साथ
• वैदिक विचार “ब्रह्म” के साथ खिलवाड़ करना
• अध्यात्म पर एक असंभव विचार अन्तिमता की मौहर लगाना
आत्म ज्ञान और अध्यात्म को साथ साथ रखना
वैदिक शब्द “आत्म-ज्ञान” और अध्यात्म को “आत्म-अध्ययन” कह कर साथ साथ इस प्रकार रख दिया कि एक समानता का भ्रम उत्पन्न हो जाए। जबकि आत्मज्ञान व्याख्या से परे की वस्तु है। वह जैसा है बस है । उसमें परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं । दूसरी ओर अध्ययन हर समय परिवर्तित होने वाली वह प्रक्रिया है जो किसी दूसरे ऐसे ही प्रयत्न को भ्रम अथवा झूठ सिद्ध कर देती है । अध्ययन इस प्रकार इस तर्क को जन्म ही नहीं बल भी देता है कि बिना अध्ययन के तो आत्म ज्ञान प्राप्त हो ही नहीं सकता इसलिए वैदिक आत्मज्ञान और अध्यात्म का आत्म-अध्ययन एक ही बात हैं। इस प्रकार एक ही वार में इस भोले से लगने वाले तर्क से एक ओर तो जनसाधारण कि दृष्टि में अपने द्वारा उत्पन्न किए गए भ्रम अध्यात्म के लिए वैदिक मान्यता प्राप्त कर ली और दूसरी ओर इस अध्ययन के लिए अपनी मन कि मर्ज़ी का पाठ्यक्रम बनाने की छूट। शायद Shakespeare को भी यह मौलिक हथकंडा मालूम होता तो कभी नहीं लिखता “what is there in a name”।
प्रचलित शब्दों के साथ खिलवाड़ तथा नए शब्दों की रचना करना
अब इस प्रकार की छूट इतनी आकर्षक एवं लुभावनी थी कि हर कोई इसका लाभ उठाने के चक्कर में पड़ गया। भला धन किसे अच्छा नहीं लगता। हर कोई अपनी अपनी विधि और अपना अपना पाठ्यक्रम लेकर, चन्दन तिलक और भस्म लगा कर निकल पड़ा भोली भाली, धर्म भीरु जनता का मूर्ख बनाने। इस प्रकार यह भारत भूमि पांडित्य विहीन, शिक्षा विहीन पंडों की भूमि बन कर रह गई। इस कार्य के लिए हर प्रकार के हथकंडों का प्रयोग किया गया। शब्दों के साथ तोड़ मरोड़,जोड़ना, घटाना नए विद्या आडम्बरी शब्दों की रचना , तथा पांडित्य पूर्ण शब्दों का दुरूपयोग; यह सब एक प्रथा के रूप में पनपते गए । धंधे की सारी तरकीबों का धडल्ले से प्रयोग किया गया । यह तरकीबें जादूभरी चालों से सजी, संगीत और गीत से मोहित करने वाली, और यहाँ तककि जो जनमानस को भयभीत करने वाली थीं । अपने अपने कारणों से बाधित राज्य के तंत्र की इच्छा बिना यह संभव नहीं था । स्वतंत्र भारत के समाज में आज भी राजकीय तंत्र आस्था के सामने घुटने टेकता ही नज़र आता है।
आत्मा के विचार की रचना करना
आत्मा का विचार किस प्रकार उत्पन्न हुआ यह एक अनुमान का विषय है । एक अनुमान जो काफी तर्क संगत तथा सटीक बैठता है कुछ इस प्रकार है । वेदों में आत्मा शब्द आत्म शब्द के एक रूप की स्तिथि में जगह जगह मिलता है। अध्यात्म के सृजनकारों को अपने भ्रमात्मक विचार के लिए वेदों की संतुति लेनी बहुत आवश्यक थी। इसी लिए वेदों में वर्णित आत्म-ज्ञान को उन्हें आत्मा-ज्ञान बनाते तनिक भी हिचकिचाहट नहीं हुई । इसके अतिरिक्त अध्यात्म के लिए पाठ्यक्रम तथा विषयवस्तु उनकी अपनी ही देन थी तो आत्मा को मुख्य विषय बनाने में उन्हें कोई झिझक नहीं हुई और इस प्रकार अध्यात्म बन गया आत्मा का अध्ययन और आत्म की उत्पत्ति के सारे विचार बन गए आत्मा की उत्पत्ति के भिन्न भिन्न मनगढ़ंत तुक्के ।
वैदिक आत्म ज्ञान के पहलूओं के साथ छेड़ छाड़ करना
वैदिक आत्मज्ञान के उपर्युक्त सारे पहलूओं के साथ इस प्रकार छेड़ छाड़ की गई कि उनका न तो कोई महत्त्व रहा न अर्थ । उदाहरण के तौर पर मनुष्य की और सृष्टि की उत्पत्ति एवं रचना को निकृष्ट और न जानने योग्य ज्ञान बता कर रद्दी की टोकरी में डाल दिया ताकि इस पर कोई भी जिज्ञासु कभी ध्यान ही न दे । अध्यात्म के आत्मा -ज्ञान के पाठ्य क्रम में इस वैदिक सिद्धांत को बिलकुल नकार दिया गया की मानव का ध्येय अज्ञान व अविद्या की अवस्थाओं से निकल कर केवल प्रज्ञा ,विवेक की ओर अग्रसर होना है । अपितु एक काल्पनिक ध्येय का निर्माण किया गया और इस बात पर बल दिया गया कि मानव का ध्येय एक काल्पनिक आत्मा को एक काल्पनिक मोक्ष कि ओर ले जाना है जो सारे कष्टों का मूल एक काल्पनिक जीवन मरण के सिद्धांत के कारण भव के बंधनों में फंसी हुई है। ऐसी कष्ट निवारक औषध को भला कौन नहीं चाहेगा ! पर ऐसे सिद्धांत कि सत्यता तो मर कर ही परखी जा सकती है। और मर कर कोई वापस आता नहीं बताने के लिए, तो बहकाते रहो और लड्डू मलाई खाते रहो ।
वैदिक सिद्धांत “ज्ञान की अक्षुणता” को सीमित करना
वेदों में वर्णित अक्षुणता का सिद्धांत जोकि न केवल आत्म के बाह्य और आन्तरिक रूपों पर समानता से लागू है अपितु सारी सृष्टि के लिए भी उतना ही सही है। अध्यात्म ने इस सिद्धांत को भी आत्म के केवल उस आन्तरिक भाग पर लागू किया जिसे इसने आत्मा की संज्ञा दी । आत्म के बाह्य स्वरूप को क्षण भंगुर और नष्ट हो जाने वाला स्थूल शारीर और अध्ययन की दृष्टि से निकृष्ट ज्ञान कह कर अवहेलना ही नहीं जिज्ञासुओं को विभिन्न ढंगों से निरुत्साहित भी किया। केवल आत्मा को आत्म का सूक्ष्म शरीर बनाकर ऐसे अनर्गल विचारों को जन्म दिया जिनको परखना तो असंभव है ही , जन साधारण के मन में जिनका भय भी उत्पन्न करना शायद एक उद्देश्य रहा हो । उदाहरण के तौर पर पुनर्जन्म, संचित कर्म , पिछले जन्मों के कर्म अर्थात प्रारब्ध,स्वर्ग नरक इत्यादि । और इस प्रकार वेदों में आत्म की सूक्ष्म संरचना जिसमें संभवतः स्मृति, संस्कार वृत्ति इत्यादि की गुण सूत्रात्मक व्याख्या थी; के भी आध्यात्मिक अर्थ ढूंढ़ लिए गए ।
वेदों से सम्बंधित दर्शनों के साथ कांट छांट करना विशेषतया पतंजलि योग शास्त्र के साथ
आत्मा के विचार को विश्वसनीयता देने के लिए अध्यात्म के जनकों ने वेदों में आत्मा शब्द की संस्कृत के व्याकरण के नियमानुसार आत्म शब्द के व्युत्त्पन्नात्मक रूप की उपस्तिथि का खूब खुल कर उपयोग किया । इसके अतिरिक्त वेदों से सम्बंधित दर्शन कणाद का वैशेषिक ,गौतम का न्याय , कपिल का सांख्य और पतंजलि का योग - सबको खूब तोड़ मरोड़ कर इनको अध्यात्म के ही विचार को पोषित करने वाले साहित्य के रूप में प्रदर्शित किया । शेष बचे दो दर्शन अर्थात जैमिनी की मीमांसा और बादरायण व्यास के वेदांत तो आरंभ से ही अध्यात्म के पोषक, प्रेरक और संभवतः जनक भी रहे । इस श्रृंखला के अंतर्गत मैं केवल पतंजलि योग के साथ की गई धांधलियों का ही विश्लेषण करूँगा । क्योंकि आत्म के व्यवहारिक पहलूओं पर जितना पतंजलि योग में चिंतन है उतना और किसी शास्त्र में नहीं है । फिर भी अध्यात्म ने योग का इतना आध्यात्मीकरण किया है कि योग एक विकृत शब्द योगा के रूप में प्रचलित हो गया है जिसका पतंजलि योग से कोई लेना देना नहीं है । इसी कारण मैंने जहाँ कहीं भी योगा शब्द का प्रयोग किया है वह उपहास के लिए किया है नाकि पतंजलि के किसी सिद्धांत कि व्याख्या करने के लिए । क्योंकि मेरा उद्देश्य योग ज्योति को प्रज्वलित करना और योगा द्वारा फैलाए गए भ्रमों का उन्मूलन है । पतंजलि द्वारा व्याख्या किए गए चित्त / पुरुष के सिद्धांत को अध्यात्मवादियों ने खींच तान करके आत्मा के विचार में परिवर्तित कर दिया है । जबकि पतंजलि का चित्त एक ठोस पहचानने लायक हर मानव के हृदय में विद्यमान एक उपकरण है जिसकी क्षमता वृत्तियों का स्वामी बनने की है क्योंकि यह प्रत्येक वृत्ति को समझ कर उसका उपयोग अथवा उपेक्षा अपने निर्णय अनुसार करता है । यह हर गुण सूत्र के समान रूपांतरित होता है और इस प्रकार अनश्वर है । यह चित्त अध्यात्मवादियों की काल्पनिक और न पहचाने जाने वाली आत्मा के विचार से बिलकुल मेल नहीं खाता है । मैं केवल आशा कर सकता हूँ कि भविष्य में कोई वैज्ञानिक इस गुणसूत्र की पहचान करले और कल के शिक्षाशास्त्री एवं समाजशास्त्री ऐसे पाठ्य क्रमों का निर्माण करें जिस से मानव के इस गुणसूत्र के भरपूर विकास और उपयोग की विधियों का विश्लेषण हो ।
वैदिक विचार “ब्रह्म” के साथ खिलवाड़ करना
अध्यात्म ने वेदों में वर्णित ईश्वर के सम्बन्ध में मूल विचार को न केवल समाप्त कर दिया अपितु ऐसे व्यक्तिक भगवानों की रचना कर दी जिनकी संख्या असंख्यों में हो गई । इन भगवानों को मानव, पशु पक्षी, पेड़ पौधों और आधे पशु आधे मानव इत्यादि के कौतुहल तथा भय उत्पन्न करने वाले रूपों में प्रस्तुत किया गया । छोटे बड़े देवी, देवता अवतारों की कल्पनाएँ मानव मन पर ऐसी छाप छोड़ गयी कि पहले से ही परिस्तिथियों वश विवश मानव सहज बुद्धि को ही गँवा बैठा और इन कल्पित देवी देवताओं में ही आश्रय खोजने लगा । वेदों में ईश्वर को कोई कल्पना नहीं समझा गया है । यह उस ठोस ज्ञान का प्रतीक है जो मानव के अन्दर बहार चारों ओर सदा से उपस्थित है और जिसे जानने खोजने के लिए ब्रह्म की संज्ञा दी गई है । चारों वेद ब्रह्म के पर्यायवाची असंख्य रूपों को भिन्न भिन्न शब्दों से प्रकट करते हैं जिन सबका एक ही अर्थ है और वह है ज्ञान; उदाहरणतया ये शब्द ॐ, प्रणव, ईश्वर, शिव, रूद्र, विष्णु, धी, प्रज्ञा, सविता विवेक प्रकाश गौ अश्व इत्यादि। ॐ तो एक प्रतीक के रूप में अधिकतर वैदिक मन्त्रों के आरंभ में केवल इस लिए प्रयोग हुआ है कि मनुष्य अपने हर प्रयास में यह कभी न भूले कि वह ज्ञान जिसे वह प्राप्त करना चाहता है उसके आसपास ही चारों ओर फैला हुआ है । परन्तु अध्यात्म ने तो इस प्रतीक को भी एक हास्यास्पद पूजा पाठ के लिए एक अर्थहीन मांगलिक शब्द बना के रख दिया है । जिस प्रकार वैदिक आत्म ज्ञान को तोड़ मरोड़ कर 'आत्मा-ज्ञान' में बदला गया ठीक उसी प्रकार वैदिक ब्रह्म ज्ञान को 'ब्रह्मा-ज्ञान' में परिवर्तित कर दिया गया । और ब्रह्मा को उस व्यक्तिक भगवन का प्रतीक बना दिया जिसके भिन्न भिन्न रूप ढूँढने की हर किसी को खुली छुट दे दी गई । इस व्यक्ति नुमा आकारयुक्त भगवन को उन सारे गुणों से सुसज्जित कर दिया जो केवल निराकार ज्ञान के ही विशेषण हो सकते हैं । आध्यात्मिक आस्था या विश्वास के नाम पर ऐसी विचित्र पूजा पाठ की विधियों का सृजन किया गया और जिनका उपयोग इस भगवन के विभिन्न काल्पनिक रूपों से काल्पनिक वरदान प्राप्त करने या काल्पनिक श्रापों से बचने के लिए किया गया। इन क्रियाओं पर कल्पनातीत धन और समय की बर्बादी की जाती है । इन विश्वास के शिकार भोले भाले लोगों को कैसे समझाया जाए कि विश्वास यदि कुछ है तो वह केवल आत्म विश्वास है और यह केवल अथक परिश्रम से प्राप्त ज्ञान के माध्यम से ही उत्पन्न होता है। ज्ञान को प्राप्त करने का कोई छोटा रास्ता नहीं है और यदि कोई छोटे रास्ते से इसे प्राप्त करने की चेष्टा करेगा तो वह रास्ता विश्वास की ओर नहीं बल्कि अंध विश्वास की ओर ही ले जाएगा। उस अकूत धन और समय का यदि थोडा सा भी भाग यदि परिश्रम और ज्ञान के लिए खर्च कर दिया जाए तो भारत संसार का हर दृष्टि से सबसे अग्रणी देश हो जाएगा ।
एक असंभव विचार “अन्तिमता” की मौहर लगाना
अपने मनमाने ढंग से अध्यात्म की व्याख्या करने की छूट ने इतने अध्यात्म के संस्करणों को जन्म दिया कि हर कोई अपने अपने अध्यात्म को ही वेदों पर आधारित और दूसरे अध्यातमों को ढकोसला सिद्ध करने कि होड़ में लग गया । हर किसी ने क्योंकि वेदों को ही आधार बनाया था और हर कोई वेदों की अपौरुषेय्ता के सिद्धांत को मानना चाहता था, तो प्रत्येक ने यह घोषणा करने में भी प्रतिस्पर्धा दिखाई कि वेदों में सारा ज्ञान निहित है , यह अंतिम है और इससे अधिक कुछ है ही नहीं क्योंकि यह ईश्वरीय है । यह एक ऐसा बचकाना दावा करना था जो वेदों के रचियताओं ने भी कहीं नहीं किया । यह अध्यात्म के पंडित इस तथ्य को मानें या न मानें पर वेदों के रचियता इस तथ्य से भली भांति परिचित थे कि वेदों में कुल मिलाकर तब तक सब मन्त्रों की संख्या इतनी थी और यह संख्या केवल एक विषय के ज्ञान को भी लिपिबद्ध करने में अधूरी थी तो सारे ज्ञान और अन्तिमता का दावा करना तो एक असंभव मूर्खता ही होगी । यदि अध्यात्म कोई पहले से उपस्तिथ , विद्यमान ज्ञान होता तो कोई संस्करण दूसरे को ढकोसला नहीं बताता और सब एक ही बात कहते । इससे तो यही सिद्ध होता है कि अध्यात्म अपने आप में ही एक ढकोसला तथा हेराफेरी से बनाया गया विचार है ।
अंग्रेजी और संस्कृत अध्यात्म में समानता का मुख्य कारण
यह स्वयंसिद्ध है कि अध्यात्म व spiritualism अपने आपको विश्वसनीय ज्ञान सिद्ध करने के लिए वेदों को अपौरुषेय ज्ञान जोकि ब्रह्मा द्वारा कुछ लोगों को दिया गया और बाइबिल को ईश्वर द्वारा अपने पुत्र ईसा पर प्रकट किया गया ज्ञान के सिद्धांत पर निर्भर करते हैं । यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि संसार के अधिकतर धर्म अपने को ईश्वर द्वारा प्रकट की गई वाणी के रूप से ही आरंभ करते हैं । यह एक संयोग तो नहीं हो सकता । अवश्य ही इसके पीछे सबसे पहले ऐसे विचार को आधार बनाने वाले धर्म का मुख्य योगदान रहा होगा । शेष धर्मों ने तो इस विचार की उपादेयता को समझकर ही केवल एक उद्देश्य “सब के द्वारा स्वीकार्यता” को तुरंत प्राप्त करने का अच्छा हथकंडा मानकर ही इस्तमाल किया है । कमज़ोर और डरपोक मनुष्य जाति आज भी इस विचार के सामने आसानी से घुटने टेक देती है । अध्यात्म का सारा पाखंड एक ताश के घर के समान तुरंत धराशायी हो जाता है यदि अपौरुषेयता तथा ज्ञान के प्रकटीकरण के धोखे भरे प्रपंचों से इसे अलग कर दिया जाए ।
अध्यात्म सब भ्रमों की जननि रूप में
अध्यात्म सारे भ्रमों की जननि है क्योंकि सारे भ्रम जो एक के बाद एक के रूप में उत्पन्न हुए इसी अध्यात्म के कारण हुए। यदि अध्यात्म किसी भी विज्ञान की भांति एक सच्चा ज्ञान होता तो यह मनुष्य की जिज्ञासा वृत्तिवश ही आज ठोस नियमों और सिद्धांतों का संकलन होता नाकि किसी दूसरे प्रकार के अध्यात्म से ढकोसला सिद्ध होने की पीड़ा झेलता हुआ एक विचार । परन्तु ऐसा होना नहीं था क्योंकि यह जिज्ञासा पर नहीं अपितु मानव की एक और वृत्ति भीरुता अर्थात दर पर आधारित था । क्योंकि इसके जनकों को स्वीकार्यता के हथकंडे अपना कर शोषण का ध्येय जो पूरा करना था । अतार्किक विश्लेषण ने आज कुतार्किक विश्लेषण की वह भयावह स्तिथि उत्पन्न कर दी है कि या तो अध्यात्म को एक निश्चित, उन्नत ज्ञान मनो नहीं तो नरक के सारे शाप और कष्ट भुगतो। आज हर हालत में स्वीकार्यता और शोषण मानव के हर अस्तित्व के विचार के नीव स्तम्भ बन गए हैं । शायद इन्हें हम अपनी सभ्यता व संस्कृति कि विशेष उपलब्धि भी समझने की भूल करने लगे हैं। इस कारण हमने अपनी विचारशैली में ऐसी प्रक्रियाओं को जन्म दिया है जिन्हें हम अपनी बुद्धि की विलक्षणता समझते हैं । ये विलक्षणताएँ हम धर्म, राजनीति, अर्थशास्त्र, प्रशाषण, प्रबंधन, दर्शन, शिक्षा, उद्योग, व्यापार, वाणिज्य इत्यादि हर क्षेत्र में ढूंढ़ लेते हैं । बस अध्यात्म द्वारा दिखाई गई शोषण व स्वीकार्यता की राह पर फिर चल पड़ते हैं इस तर्क का सहारा लेकर कि जब अध्यात्म को ही स्वीकार्यता के लिए शोषण या शोषण के लिए स्वीकार्यता धर्म कि सफलता के लिए मान्य है तो हमारे इन ज्ञान के क्षेत्रों का यह तरकीब इस्तमाल करने में कोई दोष नहीं है । किसी ना किसी प्रकार बस सफलता प्राप्त करना इन सब ज्ञान के विभागों का उद्देश्य हो गया । ये सब विभाग एक से बढ़ कर एक सुनहरी शब्द जैसे सफलता, प्रेरणा, रूचि, मुकाबला इत्यादि का उपयोग केवल शोषण के लिए करने लगे । यहाँ तक कि इन सब विषयों को विज्ञान की श्रेणी में रखा जाने लगा ताकि विज्ञानं की गवाही ली जा सके। भ्रमों का इतना बड़ा जाल फ़ैलाने के बाद भी हम किसी न किसी प्रक्रिया की असफलता रोज़ देखते हैं और सुगमता पूर्वक यह भी भूल जाते हैं कि इन प्रक्रियाओं की असफलता का मूल कारण क्या हो सकता है पर फिर भी यह मानने को तैयार नहीं होते कि ज्ञान कभी भी स्वीकार्यता के पीछे नहीं भागता और न ही इसका उद्देश्य शोषण होता है । यह तो इस कारण है किमानव का इसे ढूंढते रहना ही ज्योतिर्मयता है । तमसो मा ज्योतिर्गमय का ऋग्वेद का यह मंत्र तो यही सिद्ध करता है कि मानव का ज्ञान प्राप्त करने का एक ही लक्ष्य होना चाहिए ताकि इसका उपयोग सर्व जन हिताय , सर्व जन सुखाय के रूप में हो सके।
Saturday, July 17, 2010
Tuesday, June 22, 2010
योग ज्योति
योग ज्योति
मानो या न मानो भ्रम को पहचानो
भ्रम अथवा अविद्या की परिभाषा
मनुष्यजाति के कार्य कलाप का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ हम पूर्णता का दंभ नहीं भरते हों । पर हमारी हर कार्य प्रणाली का बार बार असफल होना तो कम से कम एक निश्चित निष्कर्ष की ओर अवश्य इंगित करता है यदि डार्विन के विकासवाद को क्रियाशील मानें तो । और वह है हमारा मस्तिष्क विकास की अभी केवल उस अवस्था में पहुंचा है जहाँ भ्रमों को सत्य मानकर उनको अपनी बुद्धि की विलक्षणता के रूप में प्रकट करना ही हमारी नियति बन गयी है। हर क्षेत्र में ये भ्रम तो उजागर हैं हीं पर इनको भ्रम न मानना भी उतना ही बड़ा दोष बन गया है हमारी मनस्थिति का । मुझे कुछ ऐसा लगता है कि जैसे ही कहीं कोई ज्ञान का कोई अंकुर हमें प्राप्त होता है उसके साथ साथ हम अज्ञान अविद्या अथवा भ्रम को भी तभी जन्म दे देतें हैं । दूसरे शब्दों में इसका अर्थ हुआ कि अविद्या अथवा भ्रमों की उत्पत्ति होने का केवल एक ही कारण है और वह है हमारा किसी भी आकस्मिक अथवा नियोजित विधि द्वारा ज्ञान को खोज लेना । ऐसी स्तिथि में ज्ञान की चिर उपस्थिति एवं मनुष्य की खोज की प्रवृत्ति की निरंतरता को तो झुटलाया नहीं जा सकता । हाँ यही वैदिक ज्ञान है जो चिर उपस्थित है , पूर्ण है , सर्वत्र व्याप्त है तथा खोजे जाने के लिए ही बिखरा पड़ा है । यह ज्ञान कभी भी अविद्या अथवा भ्रम नहीं हो सकता । मनुष्य द्वारा इसका विश्लेषण या मूल्यांकन ही भ्रमों अथवा अविद्या की परिधि में आ सकता है । इसको न जानना अंधकार या अज्ञान हो सकता है पर भ्रम अथवा अविद्या नहीं ।इसको जानने के लिए मनुष्य ज्ञान एवं कर्म इन्द्रियों द्वारा परख ,निरीक्षण तथा प्रयोग इत्यादि का सहारा लेता आया है। इसका प्रकटीकरण वह भाषा की किसी भी विधा के माध्यम से करता आया है । परन्तु जैसे ही इस प्रकटीकरण का आध्यात्मिक विश्लेषण आरम्भ होता है तभी भ्रमों अथवा अविद्या का जन्म हो जाता है ।वैज्ञानिक विश्लेषण में इस स्तिथि की उत्पत्ति अधूरेपन के कारण होती है। अध्यात्मिक विश्लेषण में यह स्तिथि पूर्णता का दावा करने के दंभ के कारण होती है। विश्लेषण की निम्न लिखित दो परिस्तिथियाँ ही विशेषकर भ्रमों को जन्म देती हैं:
• अतार्किक विश्लेषण
• कुतार्किक विश्लेषण
दोनों परिस्तिथियों में भ्रमों तथा अविद्या का कारण विश्लेषण ही है ।
अतार्किक विश्लेषण (Misinterpretation)
जिस किसी ने भी कभी किसी ज्ञान की खोज की है उसने पूर्ण सच्चाई एवं योग्यता के आधार पर उसका प्रकटीकरण किया है ।परन्तु इसका विश्लेषण करने वाले अपनी मनोवृत्ति के अनुसार इसकी ऐसी भिन्न भिन्न व्याख्याएँ करते हैं कि खोजकर्ता केवल अपना सर धुनने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता क्योंकि इन व्याख्याओं को सिवाए भ्रम के अथवा अविद्या के और कुछ नहीं कहा जा सकता । इस के अतिरिक्त एक ऐसी विवादग्रस्त स्तिथि का जन्म होता है जहाँ यह निर्णय कौन करे कि अमुक व्याख्या ही सही है । वास्तव में अनुभव के आधार पर जो सर्वमान्य नियम है वह तो यही कहता है कि ज्ञान का कभी व्याख्या भरा विश्लेषण नहीं हो सकता , वह तो केवल देखने , परखने अनुमान तथा प्रयोग आदि से ही समझा जा सकता है क्योंकि यह चिर उपस्थित है, और न इसमें कोई विवाद होता है और यदि हो भी तो सारे विवाद भी इतिहास का भाग बनकर मनुष्य कि चिर खोजी प्रवृत्ति के साक्षी बन जाते हैं। समस्या तो तभी होती है जब प्रचलित विभिन्न अध्यात्म और धर्मों को भी केवल ज्ञान ही नहीं , ज्ञानों में भी सब से महान ज्ञान कह कर प्रसारित करके सर फुटव्वल की स्तिथि में खड़ा कर दिया जाता है । परिणाम स्वरुप धर्म तथा अध्यात्म द्वारा ज्ञान के नाम पर दी गई कोई भी व्याख्या ज्ञान न रह कर अतार्किक अथवा कुतार्किक विश्लेषण के रूप में उभर कर आती है ।ज्ञान के दूसरे क्षेत्रों के उदाहरणों से इस विचार की व्याख्या की जा सकती है ।जब न्यूटन इस विचार को प्रकट करता है कि वह तो एक बालक के समान है जो समुद्र के किनारे कुछ कंकरों से खेल रहा है जबकि ज्ञान का अथाह समुद्र उसके सामने है तो वह वेदों में वर्णित ज्ञान की उस असीमितता की ओर ही संकेत कर रहा है जो "नेति नेति" में निहित है । हजारों वर्ष , भाषा तथा दूरीयाँ होते हुए भी ज्ञान के विषय में असीमितता की खोज तो तभी संभव है जब ज्ञान का यह नैसर्गिक गुण हो जो अनायास ही केवल देखने,परखने, अनुमान अथवा प्रयोग करने से ज्ञात हो जाता है । ज्ञान क्योंकि केवल इसी प्रकार हर समय उपस्तिथ रहता है तो इसकी व्याख्या की क्या आवश्यकता है? इसी प्रकार दूसरे उदाहरण में जब कीट्स कहता है कि ‘Beauty is truth, truth beauty,—that is all. Ye know on earth, and all ye need to know. अर्थात "सुन्दरता ही सत्य है , सत्य ही सुंदर है ,यही ज्ञान है केवल" तो वह ज्ञान की वैदिक धारणा 'सत्यम,शिवम् सुन्दरम ' को ही प्रतिबिंबित कर रहा है ।फिर काल, देश आदि की सीमाओं को लाँघ कर यदि दो उक्तियाँ एक ही सच्चाई को प्रकट करती हैं कि ज्ञान ही केवल सत्य है, सुंदर है तो यह तो ज्ञान का ही नैसर्गिक गुण है जो दो अलग अलग व्यक्तियों ने देखा, परखा, समझा और अनुभव करके प्रकटीकरण किया । इस में व्याख्या की क्या आवश्यकता है? परन्तु केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण ने ही इन ज्ञान की दो मूलभूत सच्चाइयों में भी इतनी व्याख्याओं को ढूंढ़ निकाला कि उनको अतार्किक विश्लेषण के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। और इस प्रकार जन्म हुआ अंधकारों का, अविद्या का तथा भ्रमों का ।
कुतार्किक विश्लेषण (Mal-interpretation)
जब निहित स्वार्थ वश किसी भी अतार्किक विश्लेषण का उपयोग शोषण के लिए किया जाता है तो वह कुतार्किक विश्लेषण बन जाता है । दूसरे शब्दों में कुतार्तिक विश्लेषण अतर्क द्वारा पहले से ही फैलाए हुए भ्रमों अथवा अविद्या का अपहरण करके इन का उपयोग भोली मानसिकता का शोषण करने में लग जाता है। शोषण के लिए आतंक, लूट, खसोट, दुराचार, हत्या, अपराध आदि की सभी सीमाओं को लांघा जा सकता है। और वह भी धर्म या अध्यात्म के नाम पर । धार्मिक उन्माद, कर्म कांड, पोप लीला,पाखंड, विभिन्न प्रकार की तांत्रिक साधनाएँ, भूत प्रेत उपचार,गण्डा तावीज़, बलि चढ़ाना इत्यादि सभी इसी श्रेणी के विश्लेषण का परिणाम हैं। अतार्किक विश्लेषण में शोषण की भावना नहीं होती या गौण रहती है जबकि कुतर्क तो जीवित ही ऐसे रह सकता है ।
भ्रमों के भयानक परिणाम
इन भ्रमों के निम्नलिखित परिणाम होते हैं:
• इस प्रकार के विश्लेषण क्रमशः ज्ञान की एक अतार्किक एवं कुतार्किक व्यवस्था को जन्म देते हैं जो कि मानव जाति के लिए एक भयावह स्तिथि है। क्योंकि अतार्किक व्यवस्था एक भ्रमों पर आधारित व्यवस्था है और कुतार्किक व्यवस्था एक दुर्व्यवस्था। एक ओर तो मनुष्य यह मान कर चलता है कि जो ज्ञान ईश्वरीय है वह पूर्ण रूप से व्यवस्थित अथवा संगठित है। उसे मनुष्य द्वारा व्यवस्थित अथवा संगठित नहीं किया जा सकता। परन्तु दूसरी ओर उसी ज्ञान को अपने मनमाने ढंग से संयोजित करने में लग जाता है। होना तो चाहिए था कि मनुष्य इस विरोधाभास को समाप्त करे परन्तु अपनी अस्मिता वश अपने संयोजन को ही ज्ञान मान बैठता है और इसी प्रकार इस का प्रसारण एवं प्रचार करता है। दूसरे शब्दों में मनुष्य ज्ञान का नहीं जिसका संयोजन असंभव है अपितु अज्ञान तथा भ्रम के संयोजन को ही ज्ञान बता कर फैलाता रहता है। यह धोका भरा भ्रम नहीं तो और क्या है?
• और यह एक सर्व विदित तथ्य है कि किसी भी प्रकार कि व्यवस्था भले ही वह कुव्यवस्था अथवा दुर्व्यवस्था क्यों न हो, व्यवस्था से जुड़े लोगों के हाथों में एक अपार शक्ति को थमा देती है जिसका वे केवल दुरूपयोग ही करते हैं। क्योंकि सदुपयोग पर यह व्यवस्था आधारित ही नहीं है। हाँ , सदुपयोग का ढोंग इनका प्रमुख हथियार है जिसका प्रयोग ये बखूबी करते हैं। क्योंकि ऐसी व्यवस्थाओं का शोषण ही तो मुख्य ध्येय होता है।
• ऐसी व्यवस्था भ्रष्टाचार को ही नहीं लालच को भी जन्म देती है जोकि असफलता का एक बहुत बड़ा कारण है। यही तो हो रहा है आज मनुष्य के हर कार्य कलाप के क्षेत्र में।
• इस प्रकार के दोनों विश्लेषण ज्ञान को पृष्ठभूमि में धकेल देते हैं और अज्ञान व अविद्या का प्रसार तेज़ गति से होने लगता है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि ज्ञान प्राप्त करने के लिए तो कठिन परिश्रम तथा तप कि आवश्यकता होती है और अज्ञान तो महनत के अतिरिक्त कोई भी संबल ढूंढ़ लेता है।
• दोनों विश्लेषण ऐसी मान्यताओं को जन्म देते हैं जिन का अनुसरण लोग आँख मूंद का करते हैं। तथा खोज करने की मानव की मूलभूत प्रवृत्ति ही निष्क्रिय हो जाती है ।
लीक से हट कर एक श्रद्धालु
इसलिए इस श्रृंखला"योग ज्योति - मानो या न मानो भ्रम को पहचानो " के अंतर्गत प्रकट किये गए विचार एक ऐसे श्रद्धालु के हैं जो लीक से हट कर है । लीक से हट कर इस लिए कि प्रचलित परंपरा गत मान्यताओं पर आधारित आध्यात्मिक तथा धार्मिक विचार जिन्हें वेदों अथवा पतंजलि योग पर आधारित कह कर प्रसारित किया जाता है, मुझे मूल पुस्तकों में कहीं नहीं मिले, और श्रद्धालु इस लिए कि पतंजलि और वेदों को ऐसे भी तो समझा जा सकता था जैसे मैं ने अपनी सहज बुद्धि से यह प्रयास किया है। इसी कारण मैं ने पतंजलि योगशास्त्र के तीसरे अध्याय जिसे विभूति पाद के नाम से जाना जाता है, के प्रत्येक उस सूत्र को व्याख्या के लिए चुना है जिसका सीधा सम्बन्ध आज भी मनुष्य के दिन प्रतिदिन के कार्य कलापों से जुड़ा हुआ है। और जिन्हें उपर्युक्त दो कारणों वश तोड़ मरोड़ कर अध्यात्म के उस सुनहरे पिंजड़े में कैद कर दिया गया है कि साधारण मनुष्य उनका उपयोग ही न कर सके और भयभीत या स्तंभित होकर ही उनको देखता रहे। मेरे इस प्रयास के मुख्यतया निम्न लिखित दो उद्देश्य हैं:
• युवा तथा आने वाली पीढ़ियों में जिज्ञासा खोज एवं आविष्कार की प्रवृत्तियों को सुगठित करना और उन्हें मान्यताओं की अंधी गलियों में से निकालना
• मान्यताओं से घिरे लोगों की जिज्ञासा की सोई प्रवृत्ति को पुनर्जागृत करना ।
मेरा यह निश्चित मत है कि आने वाली पीढियां हम से हट कर तो होंगी ही। कहने का तात्पर्य यह बिलकुल नहीं है कि हम से पहले कि पीढ़ियों में जिज्ञासा कि प्रवृत्ति नहीं थी। हमारा अस्तित्व ही उस जिज्ञासा का परिणाम है। इसीलिए हम भी पुरानी पीढ़ियों से कुछ तो अलग है। जिज्ञासा और उसका हल तो निरंतर चलने वाली प्रक्रियाएं हैं। परन्तु ऐसा क्यों होता है कि हम हर जिज्ञासा का हल एक और भ्रम में ढूंढ़ते आए हैं। कहीं भ्रम की यह अवस्था विकास की कड़ी में हमारी मानसिकता तो नहीं? पतंजलि योग में दी गई मन कि व्याख्याओं से तो यही उत्तर प्राप्त होता है। इस उत्तर के परिणाम स्वरुप हम अपनी पिछली पीढ़ियों के मुकाबले में अधिक धोखों / भ्रमों में विश्वास करते हैं क्योंकि हम इसी में बुद्धिमत्ता समझते हैं। कितना ही अरुचिकर लगे यह वाक्य पर सच्चाई के निकट तो है ही। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि पतंजलि अथवा वेदों के विचार डार्विन के पूर्वगामी हैं । समानता केवल सतही है।
क्या एक भ्रम से दूसरे भ्रम की ओर ही मानव की नियति है?
यद्यपि किसी भी प्रकार का भाग्य, नियति इत्यादि वैदिक विचारधारा में कोई स्थान नहीं रखते फिर भी तर्क के प्रारंभ करने के लिए यह वाक्य एक अच्छी शुरुआत है कि विकास के पथ में मनुष्य की यही नियति है कि वह एक के बाद एक भ्रम का सहारा लेता रहे। पर यह इस बात का भी तो अटूट संकेत है कि इस भ्रमात्मक अवस्था को ही तो अगली अवस्था के लिए एक उन्नति सोपान के रूप में कार्य करना चाहिए । और अगली अवस्था तो ऐसी ही होगी जिसमें अविद्या अथवा भ्रमों के लिए कोई स्थान न हो । परन्तु इस अवस्था में पहुँचने के लिए तो लाखों वर्ष भी संभवतः कम हों यदि विकास का यही क्रम रहा तो। अब यदि हम विभिन्न देश प्रदेशों के इतिहास पर नज़र डालें तो ऐसे उदाहरणों कि कमी नहीं है जहाँ मनुष्यों ने अविद्या एवं भ्रमों के प्रलोभनों को एक सिरे से नकार कर अनेक प्रकार के कष्ट सह कर भी हमें ज्ञान के उन सूत्रों तक पहुँचाया जो अविद्या पर लेश मात्र भी आधारित नहीं थे क्योंकि इन में किसी प्रकार का अतार्किक या कुतार्किक विश्लेषण का रंग नहीं था । जैसा उन्होंने देखा, समझा, अनुभव किया बगैर किसी रंग के प्रकट कर दिया। इस प्रकार अविद्या या भ्रमों के रास्तों से बचने की सम्भावना तो हर व्यक्ति के लिए कभी भी तथा कहीं भी हो सकती है। कौन जाने, हो सकता है यह सम्भावना मिसिंग लिंक के रूप में इसी सोपान में छुपी हो । और पतंजलि के योग शास्त्र के अनुसार इस मिसिंग लिंक का नाम है चित्त।यही चित्त वह कड़ी है मानव के विकास में जो कि अविद्या रहित, भ्रम रहित, प्रज्ञा उन्मुख विवेक आसीन कैवल्य की अवस्था की ओर ले जाती है ।
वैदिक ज्ञान की रूपरेखा
कैवल्य की इस अवस्था तक पहुँचने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि मनुष्य को भ्रम रहित ज्ञान के कुछ तो आयाम पता हो। चारों वेदों अर्थात ऋग, यजुर , साम तथा अथर्व वेद में ज्ञान की उन विशेषताओं के बारे में मालूम करने की सफलता पूर्वक कोशिश की है जिनके कारण ज्ञान को अविद्या एवं भ्रमों से मुक्त माना जा सकता है। ये आयाम विश्वसनीय होने के दो प्रमुख कारण हैं । एक तो वेदों में कहीं भी अन्तिमता का हठ नहीं है अपितु ज्ञान की असीमितता की ही चेतावनी बार बार उभर कर आती है, और दूसरा कारण है निस्पृहता का उत्कृष्ट उदाहरण जब वेदों में किसी रचयिता का उल्लेख तक नहीं मिलता है। ज्ञान के विषय में प्रकट किये गए उनके विचारों को सरसरे तौर पर उपर्युक्त चेतावनी के साथ चार भागों में बांटा जा सकता है । ज्ञान का क्षेत्र उनकी दृष्टि में इतना विस्तृत है कि उसे पूर्णता एवं असीमितता की विशेषताओं की परिभाषा के रूप में ही समझा जा सकता है। ज्ञान की इस असीमितता को वेदों की विषयवस्तु को ही असीमित तथा पूर्ण मानने के भ्रम के रूप में प्रकट किया गया है जबकि वेदों में इस प्रकार का कोई दावा नहीं है। वेदों की विषयवस्तु निम्न चार प्रयत्नों में बांटी जा सकती है :-
• आत्म ज्ञान - आन्तरिक एवं बाह्य सन्दर्भों में अपने विषय में जानने के प्रयत्न
• ब्रह्म ज्ञान - सारी सृष्टि की रचना के बारे में जानने के प्रयत्न
• यज्ञ विधान - ज्ञान को जानने की विधि के लिए किए गए प्रयत्न
• धार्मिक विधान / व्यवहारिक नैतिकता - ज्ञान को उपयोग में लाने की विधि को जानने के प्रयत्न
उपर्युक्त प्रयत्नों से यह तो प्रत्यक्ष है कि मानव ज्ञान की कोई भी शाखा जो अभी तक जानी जा चुकी है या आगे जानी जाएगी आत्मज्ञान अथवा ब्रह्मज्ञान का ही एक भाग होगी । तो ऐसी क्या आवश्यकता पड़ गई की वैदिक मनीषियों को यज्ञ विधान तथा धार्मिक विधान / व्यवहारिक नैतिकता के मापदंडों को भी जानने के प्रयत्नों की समीक्षा करनी पड़ी ? आत्मज्ञान को परखने तथा जानने की प्रक्रिया के दौरान उन्हें संभवतः यह पता चला कि मानव वृत्तिवश ही अज्ञान तथा भ्रमों को विलक्षणता मानने का सहारा लेता है अपनी त्रुटियों, कमजोरियों को छुपाने के लिए। क्योंकि यही एक सरल रास्ता भी है और उपाय भी। आज कि भाषा में इसे मानव विकास में एक भ्रम कि अवस्था से गुजरने की हालत के रूप में समझा जा सकता है। आत्म ज्ञान के सिद्धांतों में ही उन्हें पता चला कि इस अवस्था से कैसे बचा जा सकता है और उन्हों ने विवेचना कर दी उन सरल उपायों में जिनको धार्मिक विधान एवं व्यवहारिक नैतिकता के नाम से जाना जाता है। दूसरे शब्दों में उन्हें भली भांति मालूम था कि उनकी विवेचनाओं का वृत्तिवश अतार्किक विश्लेषण होगा पर निर्देशों में यह बात बताने की सावधानी बरतने में ही उन्हों ने बुद्धिमत्ता ही नहीं समझी अपितु स्वयं को उदाहरण के रूप में वेदों की रचनाओं में नाम भी न देकर इच्छाओं से ऊपर उठने की विधि प्रस्तुत की । आज के युग में हम इस विचार में निहित निस्पृहता को अच्छी प्रकार समझ सकते हैं क्योंकि यह तो पेटेंट तथा सर्वाधिकार सुरक्षितता का समय है। पतंजलि ने भी अपने योग शास्त्र में वैदिक ज्ञान को समझाने के लिए बहुत सी सावधानियां बरती जिनकी व्याख्या मैं आगे समय आने पर करूँगा। परन्तु फिर भी वेदों की उपर्युक्त चारों विषय वस्तु तथा पतंजलि योग अतार्किक व कुतार्किक विश्लेषण का शिकार होगए।
इस ब्लॉग का अतिरिक्त उद्देश्य
इस ब्लॉग का उद्देश्य उन सारे भ्रमों को जोकि वेदों की उपर्युक्त चारों विषयवस्तु के सम्बन्ध में फैलाये गए हैं एक एक कर के निश्चित कारणों के साथ सब के सामने जाँच के लिए उपस्थित करना है जिन्हें पतंजलि के नाम पर फैलाया गया है अथवा फैलाया जा रहा है ।अंधकार व अज्ञान को ज्ञान का मुखौटा पहना कर जो हानि हुई है उसकी तो भरपाई असंभव है पर आगे के लिए लेशमात्र भी संभल जाना और संभलने की दिशा में प्रयत्न करने के लिए एक पग भी उठाना एक बीमार मानसिकता के लिए एक ऐसा झटका तो हो सकता है जो एक भ्रमित को जागने के लिए मजबूर कर दे । किन ऐतिहासिक कारणों से ऐसा हुआ इस का वर्णन तो मैं अपनी एक और श्रृंखला “THIS CANNOT BE THE VEDIC THOUGHT”के अंतर्गत करूँगा परन्तु इस भ्रम से बचने की पतंजलि द्वारा दी गई विधि का मैं विस्तारपूर्वक वर्णन मैं सारे भ्रमों का विश्लेषण करने के पश्चात् करूँगा । हो सकता है की सारे भ्रमों का कारण पढने के पश्चात् पाठक उन सारे भ्रमों को अपने आप ही पहचानने की क्षमता उत्पन्न करले जोकि उसके आसपास या अन्दर घर किये बैठे हैं । पतंजलि द्वारा दिया गया हल और अपने आप खोजा गया निदान की तुलना करके कोई भी जिज्ञासु जब चाहे विकास के उस सोपान पर तो पहुँचने का प्रयत्न कर सकता है जो ज्योतिर्मय है तथा अज्ञान, अंधकार, अविद्या और धोखे भरे भ्रम से अछूता है । अज्ञानता में शायद कोई बुराई नहीं है परन्तु अज्ञानता / भ्रम को न मानना एक अशोभनीय लज्जास्पद क्रिया अवश्य है । आतंकवादी को यह समझना ही पड़ेगा की निर्दोषों की हत्या एक घृणित तथा लज्जास्पद कर्म अवश्य है ।
तो क्यों नहीं सब भ्रमों की जननि आध्यात्म से ही शुरू किया जाए यह विवेचन ?
मानो या न मानो भ्रम को पहचानो
भ्रम अथवा अविद्या की परिभाषा
मनुष्यजाति के कार्य कलाप का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ हम पूर्णता का दंभ नहीं भरते हों । पर हमारी हर कार्य प्रणाली का बार बार असफल होना तो कम से कम एक निश्चित निष्कर्ष की ओर अवश्य इंगित करता है यदि डार्विन के विकासवाद को क्रियाशील मानें तो । और वह है हमारा मस्तिष्क विकास की अभी केवल उस अवस्था में पहुंचा है जहाँ भ्रमों को सत्य मानकर उनको अपनी बुद्धि की विलक्षणता के रूप में प्रकट करना ही हमारी नियति बन गयी है। हर क्षेत्र में ये भ्रम तो उजागर हैं हीं पर इनको भ्रम न मानना भी उतना ही बड़ा दोष बन गया है हमारी मनस्थिति का । मुझे कुछ ऐसा लगता है कि जैसे ही कहीं कोई ज्ञान का कोई अंकुर हमें प्राप्त होता है उसके साथ साथ हम अज्ञान अविद्या अथवा भ्रम को भी तभी जन्म दे देतें हैं । दूसरे शब्दों में इसका अर्थ हुआ कि अविद्या अथवा भ्रमों की उत्पत्ति होने का केवल एक ही कारण है और वह है हमारा किसी भी आकस्मिक अथवा नियोजित विधि द्वारा ज्ञान को खोज लेना । ऐसी स्तिथि में ज्ञान की चिर उपस्थिति एवं मनुष्य की खोज की प्रवृत्ति की निरंतरता को तो झुटलाया नहीं जा सकता । हाँ यही वैदिक ज्ञान है जो चिर उपस्थित है , पूर्ण है , सर्वत्र व्याप्त है तथा खोजे जाने के लिए ही बिखरा पड़ा है । यह ज्ञान कभी भी अविद्या अथवा भ्रम नहीं हो सकता । मनुष्य द्वारा इसका विश्लेषण या मूल्यांकन ही भ्रमों अथवा अविद्या की परिधि में आ सकता है । इसको न जानना अंधकार या अज्ञान हो सकता है पर भ्रम अथवा अविद्या नहीं ।इसको जानने के लिए मनुष्य ज्ञान एवं कर्म इन्द्रियों द्वारा परख ,निरीक्षण तथा प्रयोग इत्यादि का सहारा लेता आया है। इसका प्रकटीकरण वह भाषा की किसी भी विधा के माध्यम से करता आया है । परन्तु जैसे ही इस प्रकटीकरण का आध्यात्मिक विश्लेषण आरम्भ होता है तभी भ्रमों अथवा अविद्या का जन्म हो जाता है ।वैज्ञानिक विश्लेषण में इस स्तिथि की उत्पत्ति अधूरेपन के कारण होती है। अध्यात्मिक विश्लेषण में यह स्तिथि पूर्णता का दावा करने के दंभ के कारण होती है। विश्लेषण की निम्न लिखित दो परिस्तिथियाँ ही विशेषकर भ्रमों को जन्म देती हैं:
• अतार्किक विश्लेषण
• कुतार्किक विश्लेषण
दोनों परिस्तिथियों में भ्रमों तथा अविद्या का कारण विश्लेषण ही है ।
अतार्किक विश्लेषण (Misinterpretation)
जिस किसी ने भी कभी किसी ज्ञान की खोज की है उसने पूर्ण सच्चाई एवं योग्यता के आधार पर उसका प्रकटीकरण किया है ।परन्तु इसका विश्लेषण करने वाले अपनी मनोवृत्ति के अनुसार इसकी ऐसी भिन्न भिन्न व्याख्याएँ करते हैं कि खोजकर्ता केवल अपना सर धुनने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता क्योंकि इन व्याख्याओं को सिवाए भ्रम के अथवा अविद्या के और कुछ नहीं कहा जा सकता । इस के अतिरिक्त एक ऐसी विवादग्रस्त स्तिथि का जन्म होता है जहाँ यह निर्णय कौन करे कि अमुक व्याख्या ही सही है । वास्तव में अनुभव के आधार पर जो सर्वमान्य नियम है वह तो यही कहता है कि ज्ञान का कभी व्याख्या भरा विश्लेषण नहीं हो सकता , वह तो केवल देखने , परखने अनुमान तथा प्रयोग आदि से ही समझा जा सकता है क्योंकि यह चिर उपस्थित है, और न इसमें कोई विवाद होता है और यदि हो भी तो सारे विवाद भी इतिहास का भाग बनकर मनुष्य कि चिर खोजी प्रवृत्ति के साक्षी बन जाते हैं। समस्या तो तभी होती है जब प्रचलित विभिन्न अध्यात्म और धर्मों को भी केवल ज्ञान ही नहीं , ज्ञानों में भी सब से महान ज्ञान कह कर प्रसारित करके सर फुटव्वल की स्तिथि में खड़ा कर दिया जाता है । परिणाम स्वरुप धर्म तथा अध्यात्म द्वारा ज्ञान के नाम पर दी गई कोई भी व्याख्या ज्ञान न रह कर अतार्किक अथवा कुतार्किक विश्लेषण के रूप में उभर कर आती है ।ज्ञान के दूसरे क्षेत्रों के उदाहरणों से इस विचार की व्याख्या की जा सकती है ।जब न्यूटन इस विचार को प्रकट करता है कि वह तो एक बालक के समान है जो समुद्र के किनारे कुछ कंकरों से खेल रहा है जबकि ज्ञान का अथाह समुद्र उसके सामने है तो वह वेदों में वर्णित ज्ञान की उस असीमितता की ओर ही संकेत कर रहा है जो "नेति नेति" में निहित है । हजारों वर्ष , भाषा तथा दूरीयाँ होते हुए भी ज्ञान के विषय में असीमितता की खोज तो तभी संभव है जब ज्ञान का यह नैसर्गिक गुण हो जो अनायास ही केवल देखने,परखने, अनुमान अथवा प्रयोग करने से ज्ञात हो जाता है । ज्ञान क्योंकि केवल इसी प्रकार हर समय उपस्तिथ रहता है तो इसकी व्याख्या की क्या आवश्यकता है? इसी प्रकार दूसरे उदाहरण में जब कीट्स कहता है कि ‘Beauty is truth, truth beauty,—that is all. Ye know on earth, and all ye need to know. अर्थात "सुन्दरता ही सत्य है , सत्य ही सुंदर है ,यही ज्ञान है केवल" तो वह ज्ञान की वैदिक धारणा 'सत्यम,शिवम् सुन्दरम ' को ही प्रतिबिंबित कर रहा है ।फिर काल, देश आदि की सीमाओं को लाँघ कर यदि दो उक्तियाँ एक ही सच्चाई को प्रकट करती हैं कि ज्ञान ही केवल सत्य है, सुंदर है तो यह तो ज्ञान का ही नैसर्गिक गुण है जो दो अलग अलग व्यक्तियों ने देखा, परखा, समझा और अनुभव करके प्रकटीकरण किया । इस में व्याख्या की क्या आवश्यकता है? परन्तु केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण ने ही इन ज्ञान की दो मूलभूत सच्चाइयों में भी इतनी व्याख्याओं को ढूंढ़ निकाला कि उनको अतार्किक विश्लेषण के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। और इस प्रकार जन्म हुआ अंधकारों का, अविद्या का तथा भ्रमों का ।
कुतार्किक विश्लेषण (Mal-interpretation)
जब निहित स्वार्थ वश किसी भी अतार्किक विश्लेषण का उपयोग शोषण के लिए किया जाता है तो वह कुतार्किक विश्लेषण बन जाता है । दूसरे शब्दों में कुतार्तिक विश्लेषण अतर्क द्वारा पहले से ही फैलाए हुए भ्रमों अथवा अविद्या का अपहरण करके इन का उपयोग भोली मानसिकता का शोषण करने में लग जाता है। शोषण के लिए आतंक, लूट, खसोट, दुराचार, हत्या, अपराध आदि की सभी सीमाओं को लांघा जा सकता है। और वह भी धर्म या अध्यात्म के नाम पर । धार्मिक उन्माद, कर्म कांड, पोप लीला,पाखंड, विभिन्न प्रकार की तांत्रिक साधनाएँ, भूत प्रेत उपचार,गण्डा तावीज़, बलि चढ़ाना इत्यादि सभी इसी श्रेणी के विश्लेषण का परिणाम हैं। अतार्किक विश्लेषण में शोषण की भावना नहीं होती या गौण रहती है जबकि कुतर्क तो जीवित ही ऐसे रह सकता है ।
भ्रमों के भयानक परिणाम
इन भ्रमों के निम्नलिखित परिणाम होते हैं:
• इस प्रकार के विश्लेषण क्रमशः ज्ञान की एक अतार्किक एवं कुतार्किक व्यवस्था को जन्म देते हैं जो कि मानव जाति के लिए एक भयावह स्तिथि है। क्योंकि अतार्किक व्यवस्था एक भ्रमों पर आधारित व्यवस्था है और कुतार्किक व्यवस्था एक दुर्व्यवस्था। एक ओर तो मनुष्य यह मान कर चलता है कि जो ज्ञान ईश्वरीय है वह पूर्ण रूप से व्यवस्थित अथवा संगठित है। उसे मनुष्य द्वारा व्यवस्थित अथवा संगठित नहीं किया जा सकता। परन्तु दूसरी ओर उसी ज्ञान को अपने मनमाने ढंग से संयोजित करने में लग जाता है। होना तो चाहिए था कि मनुष्य इस विरोधाभास को समाप्त करे परन्तु अपनी अस्मिता वश अपने संयोजन को ही ज्ञान मान बैठता है और इसी प्रकार इस का प्रसारण एवं प्रचार करता है। दूसरे शब्दों में मनुष्य ज्ञान का नहीं जिसका संयोजन असंभव है अपितु अज्ञान तथा भ्रम के संयोजन को ही ज्ञान बता कर फैलाता रहता है। यह धोका भरा भ्रम नहीं तो और क्या है?
• और यह एक सर्व विदित तथ्य है कि किसी भी प्रकार कि व्यवस्था भले ही वह कुव्यवस्था अथवा दुर्व्यवस्था क्यों न हो, व्यवस्था से जुड़े लोगों के हाथों में एक अपार शक्ति को थमा देती है जिसका वे केवल दुरूपयोग ही करते हैं। क्योंकि सदुपयोग पर यह व्यवस्था आधारित ही नहीं है। हाँ , सदुपयोग का ढोंग इनका प्रमुख हथियार है जिसका प्रयोग ये बखूबी करते हैं। क्योंकि ऐसी व्यवस्थाओं का शोषण ही तो मुख्य ध्येय होता है।
• ऐसी व्यवस्था भ्रष्टाचार को ही नहीं लालच को भी जन्म देती है जोकि असफलता का एक बहुत बड़ा कारण है। यही तो हो रहा है आज मनुष्य के हर कार्य कलाप के क्षेत्र में।
• इस प्रकार के दोनों विश्लेषण ज्ञान को पृष्ठभूमि में धकेल देते हैं और अज्ञान व अविद्या का प्रसार तेज़ गति से होने लगता है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि ज्ञान प्राप्त करने के लिए तो कठिन परिश्रम तथा तप कि आवश्यकता होती है और अज्ञान तो महनत के अतिरिक्त कोई भी संबल ढूंढ़ लेता है।
• दोनों विश्लेषण ऐसी मान्यताओं को जन्म देते हैं जिन का अनुसरण लोग आँख मूंद का करते हैं। तथा खोज करने की मानव की मूलभूत प्रवृत्ति ही निष्क्रिय हो जाती है ।
लीक से हट कर एक श्रद्धालु
इसलिए इस श्रृंखला"योग ज्योति - मानो या न मानो भ्रम को पहचानो " के अंतर्गत प्रकट किये गए विचार एक ऐसे श्रद्धालु के हैं जो लीक से हट कर है । लीक से हट कर इस लिए कि प्रचलित परंपरा गत मान्यताओं पर आधारित आध्यात्मिक तथा धार्मिक विचार जिन्हें वेदों अथवा पतंजलि योग पर आधारित कह कर प्रसारित किया जाता है, मुझे मूल पुस्तकों में कहीं नहीं मिले, और श्रद्धालु इस लिए कि पतंजलि और वेदों को ऐसे भी तो समझा जा सकता था जैसे मैं ने अपनी सहज बुद्धि से यह प्रयास किया है। इसी कारण मैं ने पतंजलि योगशास्त्र के तीसरे अध्याय जिसे विभूति पाद के नाम से जाना जाता है, के प्रत्येक उस सूत्र को व्याख्या के लिए चुना है जिसका सीधा सम्बन्ध आज भी मनुष्य के दिन प्रतिदिन के कार्य कलापों से जुड़ा हुआ है। और जिन्हें उपर्युक्त दो कारणों वश तोड़ मरोड़ कर अध्यात्म के उस सुनहरे पिंजड़े में कैद कर दिया गया है कि साधारण मनुष्य उनका उपयोग ही न कर सके और भयभीत या स्तंभित होकर ही उनको देखता रहे। मेरे इस प्रयास के मुख्यतया निम्न लिखित दो उद्देश्य हैं:
• युवा तथा आने वाली पीढ़ियों में जिज्ञासा खोज एवं आविष्कार की प्रवृत्तियों को सुगठित करना और उन्हें मान्यताओं की अंधी गलियों में से निकालना
• मान्यताओं से घिरे लोगों की जिज्ञासा की सोई प्रवृत्ति को पुनर्जागृत करना ।
मेरा यह निश्चित मत है कि आने वाली पीढियां हम से हट कर तो होंगी ही। कहने का तात्पर्य यह बिलकुल नहीं है कि हम से पहले कि पीढ़ियों में जिज्ञासा कि प्रवृत्ति नहीं थी। हमारा अस्तित्व ही उस जिज्ञासा का परिणाम है। इसीलिए हम भी पुरानी पीढ़ियों से कुछ तो अलग है। जिज्ञासा और उसका हल तो निरंतर चलने वाली प्रक्रियाएं हैं। परन्तु ऐसा क्यों होता है कि हम हर जिज्ञासा का हल एक और भ्रम में ढूंढ़ते आए हैं। कहीं भ्रम की यह अवस्था विकास की कड़ी में हमारी मानसिकता तो नहीं? पतंजलि योग में दी गई मन कि व्याख्याओं से तो यही उत्तर प्राप्त होता है। इस उत्तर के परिणाम स्वरुप हम अपनी पिछली पीढ़ियों के मुकाबले में अधिक धोखों / भ्रमों में विश्वास करते हैं क्योंकि हम इसी में बुद्धिमत्ता समझते हैं। कितना ही अरुचिकर लगे यह वाक्य पर सच्चाई के निकट तो है ही। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि पतंजलि अथवा वेदों के विचार डार्विन के पूर्वगामी हैं । समानता केवल सतही है।
क्या एक भ्रम से दूसरे भ्रम की ओर ही मानव की नियति है?
यद्यपि किसी भी प्रकार का भाग्य, नियति इत्यादि वैदिक विचारधारा में कोई स्थान नहीं रखते फिर भी तर्क के प्रारंभ करने के लिए यह वाक्य एक अच्छी शुरुआत है कि विकास के पथ में मनुष्य की यही नियति है कि वह एक के बाद एक भ्रम का सहारा लेता रहे। पर यह इस बात का भी तो अटूट संकेत है कि इस भ्रमात्मक अवस्था को ही तो अगली अवस्था के लिए एक उन्नति सोपान के रूप में कार्य करना चाहिए । और अगली अवस्था तो ऐसी ही होगी जिसमें अविद्या अथवा भ्रमों के लिए कोई स्थान न हो । परन्तु इस अवस्था में पहुँचने के लिए तो लाखों वर्ष भी संभवतः कम हों यदि विकास का यही क्रम रहा तो। अब यदि हम विभिन्न देश प्रदेशों के इतिहास पर नज़र डालें तो ऐसे उदाहरणों कि कमी नहीं है जहाँ मनुष्यों ने अविद्या एवं भ्रमों के प्रलोभनों को एक सिरे से नकार कर अनेक प्रकार के कष्ट सह कर भी हमें ज्ञान के उन सूत्रों तक पहुँचाया जो अविद्या पर लेश मात्र भी आधारित नहीं थे क्योंकि इन में किसी प्रकार का अतार्किक या कुतार्किक विश्लेषण का रंग नहीं था । जैसा उन्होंने देखा, समझा, अनुभव किया बगैर किसी रंग के प्रकट कर दिया। इस प्रकार अविद्या या भ्रमों के रास्तों से बचने की सम्भावना तो हर व्यक्ति के लिए कभी भी तथा कहीं भी हो सकती है। कौन जाने, हो सकता है यह सम्भावना मिसिंग लिंक के रूप में इसी सोपान में छुपी हो । और पतंजलि के योग शास्त्र के अनुसार इस मिसिंग लिंक का नाम है चित्त।यही चित्त वह कड़ी है मानव के विकास में जो कि अविद्या रहित, भ्रम रहित, प्रज्ञा उन्मुख विवेक आसीन कैवल्य की अवस्था की ओर ले जाती है ।
वैदिक ज्ञान की रूपरेखा
कैवल्य की इस अवस्था तक पहुँचने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि मनुष्य को भ्रम रहित ज्ञान के कुछ तो आयाम पता हो। चारों वेदों अर्थात ऋग, यजुर , साम तथा अथर्व वेद में ज्ञान की उन विशेषताओं के बारे में मालूम करने की सफलता पूर्वक कोशिश की है जिनके कारण ज्ञान को अविद्या एवं भ्रमों से मुक्त माना जा सकता है। ये आयाम विश्वसनीय होने के दो प्रमुख कारण हैं । एक तो वेदों में कहीं भी अन्तिमता का हठ नहीं है अपितु ज्ञान की असीमितता की ही चेतावनी बार बार उभर कर आती है, और दूसरा कारण है निस्पृहता का उत्कृष्ट उदाहरण जब वेदों में किसी रचयिता का उल्लेख तक नहीं मिलता है। ज्ञान के विषय में प्रकट किये गए उनके विचारों को सरसरे तौर पर उपर्युक्त चेतावनी के साथ चार भागों में बांटा जा सकता है । ज्ञान का क्षेत्र उनकी दृष्टि में इतना विस्तृत है कि उसे पूर्णता एवं असीमितता की विशेषताओं की परिभाषा के रूप में ही समझा जा सकता है। ज्ञान की इस असीमितता को वेदों की विषयवस्तु को ही असीमित तथा पूर्ण मानने के भ्रम के रूप में प्रकट किया गया है जबकि वेदों में इस प्रकार का कोई दावा नहीं है। वेदों की विषयवस्तु निम्न चार प्रयत्नों में बांटी जा सकती है :-
• आत्म ज्ञान - आन्तरिक एवं बाह्य सन्दर्भों में अपने विषय में जानने के प्रयत्न
• ब्रह्म ज्ञान - सारी सृष्टि की रचना के बारे में जानने के प्रयत्न
• यज्ञ विधान - ज्ञान को जानने की विधि के लिए किए गए प्रयत्न
• धार्मिक विधान / व्यवहारिक नैतिकता - ज्ञान को उपयोग में लाने की विधि को जानने के प्रयत्न
उपर्युक्त प्रयत्नों से यह तो प्रत्यक्ष है कि मानव ज्ञान की कोई भी शाखा जो अभी तक जानी जा चुकी है या आगे जानी जाएगी आत्मज्ञान अथवा ब्रह्मज्ञान का ही एक भाग होगी । तो ऐसी क्या आवश्यकता पड़ गई की वैदिक मनीषियों को यज्ञ विधान तथा धार्मिक विधान / व्यवहारिक नैतिकता के मापदंडों को भी जानने के प्रयत्नों की समीक्षा करनी पड़ी ? आत्मज्ञान को परखने तथा जानने की प्रक्रिया के दौरान उन्हें संभवतः यह पता चला कि मानव वृत्तिवश ही अज्ञान तथा भ्रमों को विलक्षणता मानने का सहारा लेता है अपनी त्रुटियों, कमजोरियों को छुपाने के लिए। क्योंकि यही एक सरल रास्ता भी है और उपाय भी। आज कि भाषा में इसे मानव विकास में एक भ्रम कि अवस्था से गुजरने की हालत के रूप में समझा जा सकता है। आत्म ज्ञान के सिद्धांतों में ही उन्हें पता चला कि इस अवस्था से कैसे बचा जा सकता है और उन्हों ने विवेचना कर दी उन सरल उपायों में जिनको धार्मिक विधान एवं व्यवहारिक नैतिकता के नाम से जाना जाता है। दूसरे शब्दों में उन्हें भली भांति मालूम था कि उनकी विवेचनाओं का वृत्तिवश अतार्किक विश्लेषण होगा पर निर्देशों में यह बात बताने की सावधानी बरतने में ही उन्हों ने बुद्धिमत्ता ही नहीं समझी अपितु स्वयं को उदाहरण के रूप में वेदों की रचनाओं में नाम भी न देकर इच्छाओं से ऊपर उठने की विधि प्रस्तुत की । आज के युग में हम इस विचार में निहित निस्पृहता को अच्छी प्रकार समझ सकते हैं क्योंकि यह तो पेटेंट तथा सर्वाधिकार सुरक्षितता का समय है। पतंजलि ने भी अपने योग शास्त्र में वैदिक ज्ञान को समझाने के लिए बहुत सी सावधानियां बरती जिनकी व्याख्या मैं आगे समय आने पर करूँगा। परन्तु फिर भी वेदों की उपर्युक्त चारों विषय वस्तु तथा पतंजलि योग अतार्किक व कुतार्किक विश्लेषण का शिकार होगए।
इस ब्लॉग का अतिरिक्त उद्देश्य
इस ब्लॉग का उद्देश्य उन सारे भ्रमों को जोकि वेदों की उपर्युक्त चारों विषयवस्तु के सम्बन्ध में फैलाये गए हैं एक एक कर के निश्चित कारणों के साथ सब के सामने जाँच के लिए उपस्थित करना है जिन्हें पतंजलि के नाम पर फैलाया गया है अथवा फैलाया जा रहा है ।अंधकार व अज्ञान को ज्ञान का मुखौटा पहना कर जो हानि हुई है उसकी तो भरपाई असंभव है पर आगे के लिए लेशमात्र भी संभल जाना और संभलने की दिशा में प्रयत्न करने के लिए एक पग भी उठाना एक बीमार मानसिकता के लिए एक ऐसा झटका तो हो सकता है जो एक भ्रमित को जागने के लिए मजबूर कर दे । किन ऐतिहासिक कारणों से ऐसा हुआ इस का वर्णन तो मैं अपनी एक और श्रृंखला “THIS CANNOT BE THE VEDIC THOUGHT”के अंतर्गत करूँगा परन्तु इस भ्रम से बचने की पतंजलि द्वारा दी गई विधि का मैं विस्तारपूर्वक वर्णन मैं सारे भ्रमों का विश्लेषण करने के पश्चात् करूँगा । हो सकता है की सारे भ्रमों का कारण पढने के पश्चात् पाठक उन सारे भ्रमों को अपने आप ही पहचानने की क्षमता उत्पन्न करले जोकि उसके आसपास या अन्दर घर किये बैठे हैं । पतंजलि द्वारा दिया गया हल और अपने आप खोजा गया निदान की तुलना करके कोई भी जिज्ञासु जब चाहे विकास के उस सोपान पर तो पहुँचने का प्रयत्न कर सकता है जो ज्योतिर्मय है तथा अज्ञान, अंधकार, अविद्या और धोखे भरे भ्रम से अछूता है । अज्ञानता में शायद कोई बुराई नहीं है परन्तु अज्ञानता / भ्रम को न मानना एक अशोभनीय लज्जास्पद क्रिया अवश्य है । आतंकवादी को यह समझना ही पड़ेगा की निर्दोषों की हत्या एक घृणित तथा लज्जास्पद कर्म अवश्य है ।
तो क्यों नहीं सब भ्रमों की जननि आध्यात्म से ही शुरू किया जाए यह विवेचन ?
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