योग ज्योति
मानो या न मानो भ्रम को पहचानो
भ्रम अथवा अविद्या की परिभाषा
मनुष्यजाति के कार्य कलाप का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ हम पूर्णता का दंभ नहीं भरते हों । पर हमारी हर कार्य प्रणाली का बार बार असफल होना तो कम से कम एक निश्चित निष्कर्ष की ओर अवश्य इंगित करता है यदि डार्विन के विकासवाद को क्रियाशील मानें तो । और वह है हमारा मस्तिष्क विकास की अभी केवल उस अवस्था में पहुंचा है जहाँ भ्रमों को सत्य मानकर उनको अपनी बुद्धि की विलक्षणता के रूप में प्रकट करना ही हमारी नियति बन गयी है। हर क्षेत्र में ये भ्रम तो उजागर हैं हीं पर इनको भ्रम न मानना भी उतना ही बड़ा दोष बन गया है हमारी मनस्थिति का । मुझे कुछ ऐसा लगता है कि जैसे ही कहीं कोई ज्ञान का कोई अंकुर हमें प्राप्त होता है उसके साथ साथ हम अज्ञान अविद्या अथवा भ्रम को भी तभी जन्म दे देतें हैं । दूसरे शब्दों में इसका अर्थ हुआ कि अविद्या अथवा भ्रमों की उत्पत्ति होने का केवल एक ही कारण है और वह है हमारा किसी भी आकस्मिक अथवा नियोजित विधि द्वारा ज्ञान को खोज लेना । ऐसी स्तिथि में ज्ञान की चिर उपस्थिति एवं मनुष्य की खोज की प्रवृत्ति की निरंतरता को तो झुटलाया नहीं जा सकता । हाँ यही वैदिक ज्ञान है जो चिर उपस्थित है , पूर्ण है , सर्वत्र व्याप्त है तथा खोजे जाने के लिए ही बिखरा पड़ा है । यह ज्ञान कभी भी अविद्या अथवा भ्रम नहीं हो सकता । मनुष्य द्वारा इसका विश्लेषण या मूल्यांकन ही भ्रमों अथवा अविद्या की परिधि में आ सकता है । इसको न जानना अंधकार या अज्ञान हो सकता है पर भ्रम अथवा अविद्या नहीं ।इसको जानने के लिए मनुष्य ज्ञान एवं कर्म इन्द्रियों द्वारा परख ,निरीक्षण तथा प्रयोग इत्यादि का सहारा लेता आया है। इसका प्रकटीकरण वह भाषा की किसी भी विधा के माध्यम से करता आया है । परन्तु जैसे ही इस प्रकटीकरण का आध्यात्मिक विश्लेषण आरम्भ होता है तभी भ्रमों अथवा अविद्या का जन्म हो जाता है ।वैज्ञानिक विश्लेषण में इस स्तिथि की उत्पत्ति अधूरेपन के कारण होती है। अध्यात्मिक विश्लेषण में यह स्तिथि पूर्णता का दावा करने के दंभ के कारण होती है। विश्लेषण की निम्न लिखित दो परिस्तिथियाँ ही विशेषकर भ्रमों को जन्म देती हैं:
• अतार्किक विश्लेषण
• कुतार्किक विश्लेषण
दोनों परिस्तिथियों में भ्रमों तथा अविद्या का कारण विश्लेषण ही है ।
अतार्किक विश्लेषण (Misinterpretation)
जिस किसी ने भी कभी किसी ज्ञान की खोज की है उसने पूर्ण सच्चाई एवं योग्यता के आधार पर उसका प्रकटीकरण किया है ।परन्तु इसका विश्लेषण करने वाले अपनी मनोवृत्ति के अनुसार इसकी ऐसी भिन्न भिन्न व्याख्याएँ करते हैं कि खोजकर्ता केवल अपना सर धुनने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता क्योंकि इन व्याख्याओं को सिवाए भ्रम के अथवा अविद्या के और कुछ नहीं कहा जा सकता । इस के अतिरिक्त एक ऐसी विवादग्रस्त स्तिथि का जन्म होता है जहाँ यह निर्णय कौन करे कि अमुक व्याख्या ही सही है । वास्तव में अनुभव के आधार पर जो सर्वमान्य नियम है वह तो यही कहता है कि ज्ञान का कभी व्याख्या भरा विश्लेषण नहीं हो सकता , वह तो केवल देखने , परखने अनुमान तथा प्रयोग आदि से ही समझा जा सकता है क्योंकि यह चिर उपस्थित है, और न इसमें कोई विवाद होता है और यदि हो भी तो सारे विवाद भी इतिहास का भाग बनकर मनुष्य कि चिर खोजी प्रवृत्ति के साक्षी बन जाते हैं। समस्या तो तभी होती है जब प्रचलित विभिन्न अध्यात्म और धर्मों को भी केवल ज्ञान ही नहीं , ज्ञानों में भी सब से महान ज्ञान कह कर प्रसारित करके सर फुटव्वल की स्तिथि में खड़ा कर दिया जाता है । परिणाम स्वरुप धर्म तथा अध्यात्म द्वारा ज्ञान के नाम पर दी गई कोई भी व्याख्या ज्ञान न रह कर अतार्किक अथवा कुतार्किक विश्लेषण के रूप में उभर कर आती है ।ज्ञान के दूसरे क्षेत्रों के उदाहरणों से इस विचार की व्याख्या की जा सकती है ।जब न्यूटन इस विचार को प्रकट करता है कि वह तो एक बालक के समान है जो समुद्र के किनारे कुछ कंकरों से खेल रहा है जबकि ज्ञान का अथाह समुद्र उसके सामने है तो वह वेदों में वर्णित ज्ञान की उस असीमितता की ओर ही संकेत कर रहा है जो "नेति नेति" में निहित है । हजारों वर्ष , भाषा तथा दूरीयाँ होते हुए भी ज्ञान के विषय में असीमितता की खोज तो तभी संभव है जब ज्ञान का यह नैसर्गिक गुण हो जो अनायास ही केवल देखने,परखने, अनुमान अथवा प्रयोग करने से ज्ञात हो जाता है । ज्ञान क्योंकि केवल इसी प्रकार हर समय उपस्तिथ रहता है तो इसकी व्याख्या की क्या आवश्यकता है? इसी प्रकार दूसरे उदाहरण में जब कीट्स कहता है कि ‘Beauty is truth, truth beauty,—that is all. Ye know on earth, and all ye need to know. अर्थात "सुन्दरता ही सत्य है , सत्य ही सुंदर है ,यही ज्ञान है केवल" तो वह ज्ञान की वैदिक धारणा 'सत्यम,शिवम् सुन्दरम ' को ही प्रतिबिंबित कर रहा है ।फिर काल, देश आदि की सीमाओं को लाँघ कर यदि दो उक्तियाँ एक ही सच्चाई को प्रकट करती हैं कि ज्ञान ही केवल सत्य है, सुंदर है तो यह तो ज्ञान का ही नैसर्गिक गुण है जो दो अलग अलग व्यक्तियों ने देखा, परखा, समझा और अनुभव करके प्रकटीकरण किया । इस में व्याख्या की क्या आवश्यकता है? परन्तु केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण ने ही इन ज्ञान की दो मूलभूत सच्चाइयों में भी इतनी व्याख्याओं को ढूंढ़ निकाला कि उनको अतार्किक विश्लेषण के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। और इस प्रकार जन्म हुआ अंधकारों का, अविद्या का तथा भ्रमों का ।
कुतार्किक विश्लेषण (Mal-interpretation)
जब निहित स्वार्थ वश किसी भी अतार्किक विश्लेषण का उपयोग शोषण के लिए किया जाता है तो वह कुतार्किक विश्लेषण बन जाता है । दूसरे शब्दों में कुतार्तिक विश्लेषण अतर्क द्वारा पहले से ही फैलाए हुए भ्रमों अथवा अविद्या का अपहरण करके इन का उपयोग भोली मानसिकता का शोषण करने में लग जाता है। शोषण के लिए आतंक, लूट, खसोट, दुराचार, हत्या, अपराध आदि की सभी सीमाओं को लांघा जा सकता है। और वह भी धर्म या अध्यात्म के नाम पर । धार्मिक उन्माद, कर्म कांड, पोप लीला,पाखंड, विभिन्न प्रकार की तांत्रिक साधनाएँ, भूत प्रेत उपचार,गण्डा तावीज़, बलि चढ़ाना इत्यादि सभी इसी श्रेणी के विश्लेषण का परिणाम हैं। अतार्किक विश्लेषण में शोषण की भावना नहीं होती या गौण रहती है जबकि कुतर्क तो जीवित ही ऐसे रह सकता है ।
भ्रमों के भयानक परिणाम
इन भ्रमों के निम्नलिखित परिणाम होते हैं:
• इस प्रकार के विश्लेषण क्रमशः ज्ञान की एक अतार्किक एवं कुतार्किक व्यवस्था को जन्म देते हैं जो कि मानव जाति के लिए एक भयावह स्तिथि है। क्योंकि अतार्किक व्यवस्था एक भ्रमों पर आधारित व्यवस्था है और कुतार्किक व्यवस्था एक दुर्व्यवस्था। एक ओर तो मनुष्य यह मान कर चलता है कि जो ज्ञान ईश्वरीय है वह पूर्ण रूप से व्यवस्थित अथवा संगठित है। उसे मनुष्य द्वारा व्यवस्थित अथवा संगठित नहीं किया जा सकता। परन्तु दूसरी ओर उसी ज्ञान को अपने मनमाने ढंग से संयोजित करने में लग जाता है। होना तो चाहिए था कि मनुष्य इस विरोधाभास को समाप्त करे परन्तु अपनी अस्मिता वश अपने संयोजन को ही ज्ञान मान बैठता है और इसी प्रकार इस का प्रसारण एवं प्रचार करता है। दूसरे शब्दों में मनुष्य ज्ञान का नहीं जिसका संयोजन असंभव है अपितु अज्ञान तथा भ्रम के संयोजन को ही ज्ञान बता कर फैलाता रहता है। यह धोका भरा भ्रम नहीं तो और क्या है?
• और यह एक सर्व विदित तथ्य है कि किसी भी प्रकार कि व्यवस्था भले ही वह कुव्यवस्था अथवा दुर्व्यवस्था क्यों न हो, व्यवस्था से जुड़े लोगों के हाथों में एक अपार शक्ति को थमा देती है जिसका वे केवल दुरूपयोग ही करते हैं। क्योंकि सदुपयोग पर यह व्यवस्था आधारित ही नहीं है। हाँ , सदुपयोग का ढोंग इनका प्रमुख हथियार है जिसका प्रयोग ये बखूबी करते हैं। क्योंकि ऐसी व्यवस्थाओं का शोषण ही तो मुख्य ध्येय होता है।
• ऐसी व्यवस्था भ्रष्टाचार को ही नहीं लालच को भी जन्म देती है जोकि असफलता का एक बहुत बड़ा कारण है। यही तो हो रहा है आज मनुष्य के हर कार्य कलाप के क्षेत्र में।
• इस प्रकार के दोनों विश्लेषण ज्ञान को पृष्ठभूमि में धकेल देते हैं और अज्ञान व अविद्या का प्रसार तेज़ गति से होने लगता है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि ज्ञान प्राप्त करने के लिए तो कठिन परिश्रम तथा तप कि आवश्यकता होती है और अज्ञान तो महनत के अतिरिक्त कोई भी संबल ढूंढ़ लेता है।
• दोनों विश्लेषण ऐसी मान्यताओं को जन्म देते हैं जिन का अनुसरण लोग आँख मूंद का करते हैं। तथा खोज करने की मानव की मूलभूत प्रवृत्ति ही निष्क्रिय हो जाती है ।
लीक से हट कर एक श्रद्धालु
इसलिए इस श्रृंखला"योग ज्योति - मानो या न मानो भ्रम को पहचानो " के अंतर्गत प्रकट किये गए विचार एक ऐसे श्रद्धालु के हैं जो लीक से हट कर है । लीक से हट कर इस लिए कि प्रचलित परंपरा गत मान्यताओं पर आधारित आध्यात्मिक तथा धार्मिक विचार जिन्हें वेदों अथवा पतंजलि योग पर आधारित कह कर प्रसारित किया जाता है, मुझे मूल पुस्तकों में कहीं नहीं मिले, और श्रद्धालु इस लिए कि पतंजलि और वेदों को ऐसे भी तो समझा जा सकता था जैसे मैं ने अपनी सहज बुद्धि से यह प्रयास किया है। इसी कारण मैं ने पतंजलि योगशास्त्र के तीसरे अध्याय जिसे विभूति पाद के नाम से जाना जाता है, के प्रत्येक उस सूत्र को व्याख्या के लिए चुना है जिसका सीधा सम्बन्ध आज भी मनुष्य के दिन प्रतिदिन के कार्य कलापों से जुड़ा हुआ है। और जिन्हें उपर्युक्त दो कारणों वश तोड़ मरोड़ कर अध्यात्म के उस सुनहरे पिंजड़े में कैद कर दिया गया है कि साधारण मनुष्य उनका उपयोग ही न कर सके और भयभीत या स्तंभित होकर ही उनको देखता रहे। मेरे इस प्रयास के मुख्यतया निम्न लिखित दो उद्देश्य हैं:
• युवा तथा आने वाली पीढ़ियों में जिज्ञासा खोज एवं आविष्कार की प्रवृत्तियों को सुगठित करना और उन्हें मान्यताओं की अंधी गलियों में से निकालना
• मान्यताओं से घिरे लोगों की जिज्ञासा की सोई प्रवृत्ति को पुनर्जागृत करना ।
मेरा यह निश्चित मत है कि आने वाली पीढियां हम से हट कर तो होंगी ही। कहने का तात्पर्य यह बिलकुल नहीं है कि हम से पहले कि पीढ़ियों में जिज्ञासा कि प्रवृत्ति नहीं थी। हमारा अस्तित्व ही उस जिज्ञासा का परिणाम है। इसीलिए हम भी पुरानी पीढ़ियों से कुछ तो अलग है। जिज्ञासा और उसका हल तो निरंतर चलने वाली प्रक्रियाएं हैं। परन्तु ऐसा क्यों होता है कि हम हर जिज्ञासा का हल एक और भ्रम में ढूंढ़ते आए हैं। कहीं भ्रम की यह अवस्था विकास की कड़ी में हमारी मानसिकता तो नहीं? पतंजलि योग में दी गई मन कि व्याख्याओं से तो यही उत्तर प्राप्त होता है। इस उत्तर के परिणाम स्वरुप हम अपनी पिछली पीढ़ियों के मुकाबले में अधिक धोखों / भ्रमों में विश्वास करते हैं क्योंकि हम इसी में बुद्धिमत्ता समझते हैं। कितना ही अरुचिकर लगे यह वाक्य पर सच्चाई के निकट तो है ही। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि पतंजलि अथवा वेदों के विचार डार्विन के पूर्वगामी हैं । समानता केवल सतही है।
क्या एक भ्रम से दूसरे भ्रम की ओर ही मानव की नियति है?
यद्यपि किसी भी प्रकार का भाग्य, नियति इत्यादि वैदिक विचारधारा में कोई स्थान नहीं रखते फिर भी तर्क के प्रारंभ करने के लिए यह वाक्य एक अच्छी शुरुआत है कि विकास के पथ में मनुष्य की यही नियति है कि वह एक के बाद एक भ्रम का सहारा लेता रहे। पर यह इस बात का भी तो अटूट संकेत है कि इस भ्रमात्मक अवस्था को ही तो अगली अवस्था के लिए एक उन्नति सोपान के रूप में कार्य करना चाहिए । और अगली अवस्था तो ऐसी ही होगी जिसमें अविद्या अथवा भ्रमों के लिए कोई स्थान न हो । परन्तु इस अवस्था में पहुँचने के लिए तो लाखों वर्ष भी संभवतः कम हों यदि विकास का यही क्रम रहा तो। अब यदि हम विभिन्न देश प्रदेशों के इतिहास पर नज़र डालें तो ऐसे उदाहरणों कि कमी नहीं है जहाँ मनुष्यों ने अविद्या एवं भ्रमों के प्रलोभनों को एक सिरे से नकार कर अनेक प्रकार के कष्ट सह कर भी हमें ज्ञान के उन सूत्रों तक पहुँचाया जो अविद्या पर लेश मात्र भी आधारित नहीं थे क्योंकि इन में किसी प्रकार का अतार्किक या कुतार्किक विश्लेषण का रंग नहीं था । जैसा उन्होंने देखा, समझा, अनुभव किया बगैर किसी रंग के प्रकट कर दिया। इस प्रकार अविद्या या भ्रमों के रास्तों से बचने की सम्भावना तो हर व्यक्ति के लिए कभी भी तथा कहीं भी हो सकती है। कौन जाने, हो सकता है यह सम्भावना मिसिंग लिंक के रूप में इसी सोपान में छुपी हो । और पतंजलि के योग शास्त्र के अनुसार इस मिसिंग लिंक का नाम है चित्त।यही चित्त वह कड़ी है मानव के विकास में जो कि अविद्या रहित, भ्रम रहित, प्रज्ञा उन्मुख विवेक आसीन कैवल्य की अवस्था की ओर ले जाती है ।
वैदिक ज्ञान की रूपरेखा
कैवल्य की इस अवस्था तक पहुँचने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि मनुष्य को भ्रम रहित ज्ञान के कुछ तो आयाम पता हो। चारों वेदों अर्थात ऋग, यजुर , साम तथा अथर्व वेद में ज्ञान की उन विशेषताओं के बारे में मालूम करने की सफलता पूर्वक कोशिश की है जिनके कारण ज्ञान को अविद्या एवं भ्रमों से मुक्त माना जा सकता है। ये आयाम विश्वसनीय होने के दो प्रमुख कारण हैं । एक तो वेदों में कहीं भी अन्तिमता का हठ नहीं है अपितु ज्ञान की असीमितता की ही चेतावनी बार बार उभर कर आती है, और दूसरा कारण है निस्पृहता का उत्कृष्ट उदाहरण जब वेदों में किसी रचयिता का उल्लेख तक नहीं मिलता है। ज्ञान के विषय में प्रकट किये गए उनके विचारों को सरसरे तौर पर उपर्युक्त चेतावनी के साथ चार भागों में बांटा जा सकता है । ज्ञान का क्षेत्र उनकी दृष्टि में इतना विस्तृत है कि उसे पूर्णता एवं असीमितता की विशेषताओं की परिभाषा के रूप में ही समझा जा सकता है। ज्ञान की इस असीमितता को वेदों की विषयवस्तु को ही असीमित तथा पूर्ण मानने के भ्रम के रूप में प्रकट किया गया है जबकि वेदों में इस प्रकार का कोई दावा नहीं है। वेदों की विषयवस्तु निम्न चार प्रयत्नों में बांटी जा सकती है :-
• आत्म ज्ञान - आन्तरिक एवं बाह्य सन्दर्भों में अपने विषय में जानने के प्रयत्न
• ब्रह्म ज्ञान - सारी सृष्टि की रचना के बारे में जानने के प्रयत्न
• यज्ञ विधान - ज्ञान को जानने की विधि के लिए किए गए प्रयत्न
• धार्मिक विधान / व्यवहारिक नैतिकता - ज्ञान को उपयोग में लाने की विधि को जानने के प्रयत्न
उपर्युक्त प्रयत्नों से यह तो प्रत्यक्ष है कि मानव ज्ञान की कोई भी शाखा जो अभी तक जानी जा चुकी है या आगे जानी जाएगी आत्मज्ञान अथवा ब्रह्मज्ञान का ही एक भाग होगी । तो ऐसी क्या आवश्यकता पड़ गई की वैदिक मनीषियों को यज्ञ विधान तथा धार्मिक विधान / व्यवहारिक नैतिकता के मापदंडों को भी जानने के प्रयत्नों की समीक्षा करनी पड़ी ? आत्मज्ञान को परखने तथा जानने की प्रक्रिया के दौरान उन्हें संभवतः यह पता चला कि मानव वृत्तिवश ही अज्ञान तथा भ्रमों को विलक्षणता मानने का सहारा लेता है अपनी त्रुटियों, कमजोरियों को छुपाने के लिए। क्योंकि यही एक सरल रास्ता भी है और उपाय भी। आज कि भाषा में इसे मानव विकास में एक भ्रम कि अवस्था से गुजरने की हालत के रूप में समझा जा सकता है। आत्म ज्ञान के सिद्धांतों में ही उन्हें पता चला कि इस अवस्था से कैसे बचा जा सकता है और उन्हों ने विवेचना कर दी उन सरल उपायों में जिनको धार्मिक विधान एवं व्यवहारिक नैतिकता के नाम से जाना जाता है। दूसरे शब्दों में उन्हें भली भांति मालूम था कि उनकी विवेचनाओं का वृत्तिवश अतार्किक विश्लेषण होगा पर निर्देशों में यह बात बताने की सावधानी बरतने में ही उन्हों ने बुद्धिमत्ता ही नहीं समझी अपितु स्वयं को उदाहरण के रूप में वेदों की रचनाओं में नाम भी न देकर इच्छाओं से ऊपर उठने की विधि प्रस्तुत की । आज के युग में हम इस विचार में निहित निस्पृहता को अच्छी प्रकार समझ सकते हैं क्योंकि यह तो पेटेंट तथा सर्वाधिकार सुरक्षितता का समय है। पतंजलि ने भी अपने योग शास्त्र में वैदिक ज्ञान को समझाने के लिए बहुत सी सावधानियां बरती जिनकी व्याख्या मैं आगे समय आने पर करूँगा। परन्तु फिर भी वेदों की उपर्युक्त चारों विषय वस्तु तथा पतंजलि योग अतार्किक व कुतार्किक विश्लेषण का शिकार होगए।
इस ब्लॉग का अतिरिक्त उद्देश्य
इस ब्लॉग का उद्देश्य उन सारे भ्रमों को जोकि वेदों की उपर्युक्त चारों विषयवस्तु के सम्बन्ध में फैलाये गए हैं एक एक कर के निश्चित कारणों के साथ सब के सामने जाँच के लिए उपस्थित करना है जिन्हें पतंजलि के नाम पर फैलाया गया है अथवा फैलाया जा रहा है ।अंधकार व अज्ञान को ज्ञान का मुखौटा पहना कर जो हानि हुई है उसकी तो भरपाई असंभव है पर आगे के लिए लेशमात्र भी संभल जाना और संभलने की दिशा में प्रयत्न करने के लिए एक पग भी उठाना एक बीमार मानसिकता के लिए एक ऐसा झटका तो हो सकता है जो एक भ्रमित को जागने के लिए मजबूर कर दे । किन ऐतिहासिक कारणों से ऐसा हुआ इस का वर्णन तो मैं अपनी एक और श्रृंखला “THIS CANNOT BE THE VEDIC THOUGHT”के अंतर्गत करूँगा परन्तु इस भ्रम से बचने की पतंजलि द्वारा दी गई विधि का मैं विस्तारपूर्वक वर्णन मैं सारे भ्रमों का विश्लेषण करने के पश्चात् करूँगा । हो सकता है की सारे भ्रमों का कारण पढने के पश्चात् पाठक उन सारे भ्रमों को अपने आप ही पहचानने की क्षमता उत्पन्न करले जोकि उसके आसपास या अन्दर घर किये बैठे हैं । पतंजलि द्वारा दिया गया हल और अपने आप खोजा गया निदान की तुलना करके कोई भी जिज्ञासु जब चाहे विकास के उस सोपान पर तो पहुँचने का प्रयत्न कर सकता है जो ज्योतिर्मय है तथा अज्ञान, अंधकार, अविद्या और धोखे भरे भ्रम से अछूता है । अज्ञानता में शायद कोई बुराई नहीं है परन्तु अज्ञानता / भ्रम को न मानना एक अशोभनीय लज्जास्पद क्रिया अवश्य है । आतंकवादी को यह समझना ही पड़ेगा की निर्दोषों की हत्या एक घृणित तथा लज्जास्पद कर्म अवश्य है ।
तो क्यों नहीं सब भ्रमों की जननि आध्यात्म से ही शुरू किया जाए यह विवेचन ?
# mujhe lagta hai agar mein apne star ki baat karun ya yun kahun ki meine ab tak jo pata hai ya jitna gyan mujhe hai,us hisaab se is blog pe mera comment sahi nahi hoga,kyunki mera gyan is vishay mein bahut kam hai,mein is blog ko padhta rahunga , aur ispar apni pratikriyaein vyakt karta rahunga.jaisa ki apne hi kaha hai ki "अज्ञानता में शायद कोई बुराई नहीं है परन्तु अज्ञानता / भ्रम को न मानना एक अशोभनीय लज्जास्पद क्रिया अवश्य है" , isi prakaar agar abhi mein apni pratikriya vyakt karta hun to yeh mera thotha gyan kehlayega.
ReplyDelete#आत्म ज्ञान
#ब्रह्म ज्ञान
ke baare mein to meine bhi suna tha par
यज्ञ विधान
धार्मिक विधान / व्यवहारिक नैतिकता
ke baare mein nahi suna tha, aapne ko jaan'ne mein aadmi ko badi ruchi hoti hai par poori tarah se na jaane jaane ke kaaran woh apne jeevan ke sath khilwad karta hai, aur isi atma gyan ko paane ke liye woh dar dar ki thokar khata hai , aur bahut hi kam manushya is dharti par honge jo is atma gyan ko paaye honge.
shristi ki sanrachna ke baare mein jaan'na humesha hi apne aap mein romanchit karne ka vishay raha hai,har aadmi yeh jaana chahta hai ki kyu is shrishti ki rachna hui, kyu use is shrishti ka hissa banaya gaya.
parantu
#यज्ञ विधान - ज्ञान को जानने की विधि के लिए किए गए प्रयत्न
# धार्मिक विधान / व्यवहारिक नैतिकता - ज्ञान को उपयोग में लाने की विधि को जानने के प्रयत्न
ke baare mein kabhi suna nahi , par inhe padh ke inke baare mein jaane ki iccha mere andar jyada ubhar ke aarahi hai.kyunki mein humesha se sadhu babao ke pravachan , gyan ki kahaniya,logo se gyan vardhak baatein sunta aaya hun, par is gyan ko upyog mein laane ki vidhi kya hai , iska varnan koi nahi karta, aasha karta hun ki aage ke blogs mein aap humein is gyan se bhi avgat karaeinge.dhanyawaad