Monday, February 13, 2012

दूसरा भ्रम - धर्म

दूसरा भ्रम - धर्म
योग ज्योति
मानो या न मानो – भ्रम को पहचानो
मुख्य विचार का पूर्वालोकन
ईश्वर तो किसी भी मानव निर्मित धर्म की उत्पत्ति से बहुत पहले ही विद्यमान होना चाहिए। इस तथ्य के बावजूद भी सारी मानवता को विभिन्न धर्मों ने अपने अपने द्वारा निर्मित भगवानों में ही विश्वास कर बहकने को बाधित कर दिया है । इन सारे कृत्रिम भगवानों में कोई समानता नहीं है। अपने अपने अनुयायियों की दृष्टि में सब एक दूसरे से महान हैं। ये सब अपने अपने सम्प्रदायों के रक्षक व हितैषी हैं । इसी लिए एक व्यक्ति को अपने ही भगवान से डरने की शिक्षा दी जाती है क्योंकि दूसरों का भगवान तो उसका कुछ बिगाड़ ही नहीं सकता। इसी लिए किसी दूसरे भगवान को तो गाली देने, अपमानित करने या नष्ट करने का खेल चलता रहता है। इस तर्क का तो यह निष्कर्ष निकलता है कि इन सारे मानव निर्मित धर्मों द्वारा कल्पित भगवानों की तो नष्ट होने की ही नियति बनती है। ऐसे भगवानों के बारे में कोई भी जानकारी प्राप्त करने का तो कोई औचित्य ही नहीं रह जाता क्योंकि ये सारे भगवान एकांगी, पक्षपाती, भय उत्पन्न करने वाले व नष्टप्राय हैं। फिर तो भगवान की यह सारी कल्पना ही एक भ्रम होना चाहिए। यही p धर्मों का इतिहास है । बहुत से आए और बहुत से चले गए क्योंकि मानव एक भ्रम से निकल कर दूसरे भ्रम में जीवित रहने को ही बुद्धिमत्ता समझता है। क्या ईश्वर इन मानव निर्मित भगवानों से स्वतंत्र किसी रूप में मौजूद नहीं हो सकता ? हाँ, हो सकता है और ईश्वर इसी स्वतंत्र रूप में अवस्थित है। यही तो मानव के संभवतः प्राचीनतम ज्ञान व भारतीय महाद्वीप की देन वेद की पुस्तकों की विषय वस्तु है। यह लेख वेदों में ईश्वर से सम्बंधित व्याख्याओं पर आधारित है। धर्म को वेदों में एक विभिन्न विचार और भिन्न अर्थों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसके आज समझे जाने वाले अर्थ तो बिलकुल भी नहीं हैं क्योंकि इस शब्द की व्याख्या में न तो किसी व्यक्ति का उल्लेख है और न किसी धार्मिक संप्रदाय को प्रारंभ करने का हठ है। वेद किसी धर्म विशेष की पुस्तकें नहीं हैं। ये तो ज्ञान की पुस्तकें हैं जिनकी विषय वस्तु है - "क्या जानना है", "कैसे जानना है" और "कैसे उस जानकारी का उपयोग करना है"। दूसरे शब्दों में वेदों में वैदिक धर्म नाम की कोई कल्पना नहीं है। विभिन्न मानव सभ्यताओं का आधुनिक धर्म तो एक बहुत ही भ्रमात्मक विचार है और भारतीय परिवेश में तो यह निश्चित ही वैदिक शब्द “धर्म” का विकृत रूप है कैसे ?
क्यों है धर्म एक भ्रम
सारे संसार में अध्यात्म की भांति धर्म भी एक बहुत बड़ा व्यापारिक उपक्रम है । धार्मिक संस्थानों की घोषित व अघोषित धनराशि इतनी आश्चर्य चकित करने वाली अपार संख्या है कि इसके ऊपर अर्थशास्त्र के मंदी और तेज़ी के नियमों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता । पृथ्वी पर ऐसे राज्यों की कभी कमी नहीं रही है जो अपने को किसी धर्म आधारित व्यवस्था का पोषक मानने में गर्व का अनुभव करते हैं । वैटिकन सिटी का राज्य तो संसार का आकार में सबसे छोटा राज्य होते हुए भी वरीयता के क्रम में और राष्ट्रों ने सर्व प्रथम मान लिया है । बहुत बड़ी जनसँख्या के लिए तो धर्म एक सनक के समान है । इतना बहुमत धर्म के पक्ष में होते हुए भी पिछली शताब्दी ने कम्युनिस्ट विचारधारा की इस मूर्खता को पनपते, फूलते देखा जहाँ राज्यों ने धर्म को अपनी हर संस्थाओं में से बलपूर्वक बिलकुल निष्काषित कर दिया । परन्तु फिर भी अंत में अपने प्रयास में असफल हो गए । क्या कम्युनिज्म की असफलता और धर्म के पक्ष में विशाल बहुमत ऐसे कारण हो सकते हैं जिनसे धर्म को एक भ्रम न समझा जाए ? या इसके विपरीत यह सत्य अधिक सटीक है कि बहुमत तो इस बात का प्रमाण है कि अविद्या ने भ्रमके दाव पेचों का सहारा लेकर अपना विशाल जाल बुन लिया है । क्योंकि विद्या प्राप्त करने के लिए तो कोई छोटा रास्ता नहीं होता । इसके लिए तो कर्मठता ही विकल्प है जो बहुमत के लिए संभव नहीं हैं खास तौर पर जबकि बहुमत को यह घुट्टी पिला दी जाए कि कर्मकांड की अकर्मण्यता ही सबसे बड़ा श्रम है । कम्युनिज्म की असफलता का कारण तो वेदों व पतंजलि योग के इस सिद्धांत में वर्णित है की मानव एक ऐसी अवस्था में है जिसका लक्षण ही यह है कि वह एक भ्रम से दूसरे भ्रम को विलक्षण मान कर जन्म देता रहता है। मानव ने अपनी विकास अवस्थानुसार धर्म के ही भ्रम को समाप्त करने के लिए एक और भ्रम कम्युनिज्म की रचना कर दी और असफल होकर और भ्रम तलाशने में लग गया । राज्य और पादरी समाज ने ही कभी इतिहास में धर्म का भ्रम फैलाया था और राज्य ने ही उसे समाप्त करने के लिए एक और भ्रम कम्युनिज्म की स्थापना की थी । धर्म को भ्रम के रूप में कैसे फैलाया जाता है यह जानने के लिए आवश्यक है कि यह समझा जाए कि साधारण मानव धर्म से क्या समझता है ।
धर्म और साधारण मानव
एक साधारण मानव के लिए उसके सारे क्रियाकलाप धर्म के नाम पर निम्नलिखित चार मापदंडों से प्रभावित होते हैं:-
• ईश्वर
• आत्मा
• कर्मकांड
• धार्मिक नैतिकता
संसार के सारे धर्मों ने आस्था विश्वास आदि के सारे हथकंडों का सफलतापूर्वक प्रयोग केवल इसलिए किया है ताकि अधिक से अधिक मानवों को किसी धर्म विशेष द्वारा परिभाषित ही उपर्युक्त मापदंडों का अनुयायी बनाया जा सके । इस प्रकार हर कोई एक काल्पनिक दौड़ में प्रतियोगी बन गया है जहाँ वह अपने आपको औरों के मुकाबले में बड़ा भगत, बड़ा ईश्वर भीरु, बड़ा धर्म अनुयायी और इस प्रकार एक बड़ा पहुंचा हुआ व्यक्ति कहला सके । आश्चर्य जनक बात यह है कि इस दौड़ का कोई निर्णायक नहीं है । हर व्यक्ति केवल यह समझने लगा है कि आस पास सब उसे ही देख रहे है इसलिए वह भी उन सारे धार्मिक कर्मकांड के हथकंडों का अनायास ही पालन करने लगता है जिनके अर्थों को वह समझता भी नहीं है और समझने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि इस दौड़ में भाग लेने की केवल एक ही आसान सी श्रमहीन शर्त तो रह जाती है कि तर्क को भूल जाओ और आस्था की कठिन परीक्षा में पास हो जाओ क्योंकि विश्वास तो तर्क से बहुत ऊपर की कल्पना है जहाँ तर्क पहुँच ही नहीं सकता । “समझो तो शंकर है नहीं तो कंकर है” – और इस प्रकार महान कहलाने का गौरव प्राप्त करो । महान बनते हैं कि नहीं, महान कहलाते हैं कि नहीं – यह दूसरी बात है । पर यह निश्चित है कि हर साधारण व्यक्ति एक अनुकूलता का ऐसा शिकार हो जाता है कि जहाँ वह अपनी महानता के भ्रम को बनाए रखने के लिए विश्वास का सहारा लेता है । यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि ऐसे निश्चित मत के पीछे या तो कोई निश्चित तर्क होना चाहिए जिसको ऐसा व्यक्ति या तो जानना नहीं चाहता या उसकी शब्दों में व्याख्या नहीं कर सकता । इस व्यवहार की आसानी से व्याख्या की जा सकती है । क्योंकि कोई तर्क ही नहीं है तो उसकी शब्दों में व्याख्या कैसे की जाए। उसे तो गूंगे का गुड कहकर ही महानता का भ्रम बनाए रखा जाएगा और और बोलने की तुलना चाँदी से और चुप रहने की तुलना सोने से की जाएगी ( speech is silver, silence is golden) । यह तर्क का कुतर्क नहीं तो क्या है ? हाँ, आस्था विश्वास जैसे शब्द केवल तर्क के कुतर्क ही हैं । यदि आस्था नाम की कोई चीज़ है तो वह दृढ विश्वास ही होगा जो केवल उस ज्ञान से प्राप्त होता है जिस ज्ञान को वेदों में ईश्वर की संज्ञा दी गई है और यह कठिन परिश्रम, पुरुषार्थ व तप से ही उत्पन्न होता है। उस के लिए कर्मकांड जैसा कोई छोटा सरल रास्ता हो ही नहीं सकता । आस्था और विश्वास तो अंध विश्वास के छोटे सरल रास्ते ही हैं जिनका केवल एक उद्देश्य रहा है कि किसी न किसी प्रकार अनुयायियों की संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़त हो । आस्था के चंगुल में आने का अर्थ तो यह है कि हम अपनी मानव अवस्था को ही नकार देते हैं क्योंकि मानव की तो पहचान ही तर्क है । कठिन से कठिन तर्कों को सुगमता से समझने में ही तो मानव का विकास है नाकि तर्क को ताक पर रख कर आस्था की निष्क्रियता में खो जाना । ऐसे मानव की तो पशु अवस्था से तुलना की जा सकती है जो वृत्ति वश ही सटीक व्यवहार करते हैं और अपनी पशुत्त्व की विशिष्टता बनाए रखते हैं जबकि ऐसा मानव तो अपनी विशिष्ट क्षमता जो तर्क में ही है को खो बैठता है । या यों कहो कि यदि हम विश्वास को ही महान तर्क समझ बैठते हैं तो मानव अभी विकास की किसी ऐसी अवस्था में है जो तर्क के विकास की दृष्टि से अभी पशु के अधिक निकट है और अपने को इस प्रकार आस्था के भ्रम में ही रखने को श्रेयस्कर समझती है । मेरे विचार में यह व्याख्या अधिक तर्कसंगत है कि मानव शायद अपने को भ्रम अवस्था में ही रखने के लिए बाध्य है । पतंजलि और वेदों के अनुसार भी यही मान्यता है । आत्मज्ञान के अंतर्गत विश्लेषणों में वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भ्रमावस्था भी मानव की एक अवस्था है जिसमें हम पुरुषार्थ से बचने के लिए ही ऐसे शब्दों की रचना करते हैं । माया जिसका अर्थ भ्रम ही है को हम तर्क की उच्च अवस्था मानकर आस्था और विश्वास आदि तर्कहीन शब्दों से इसकी व्याख्या करते हैं । परन्तु पतंजलि के अनुसार कोई भी व्यक्ति कहीं भी जब चाहे तभी इस अवस्था से बहार निकल सकता है । निकलने की विधि का नाम योग है जिसका मैं आगे चलकर विस्तार से वर्णन करूँगा । अभी तो केवल इतना समझ लेना लेना ही पर्याप्त है कि हर धर्म ने साधारण मानव के लिए उपर्युक्त चारों मापदंडों की अपनी अपनी विरोधाभासी व्याख्याएँ की है और साधारण मानव इनके कुचक्रों में फंस कर रह गया है । यदि धर्म की कल्पना भ्रम न होती तो विभिन्न धर्म इन चारों विषय पर एक ही बात कहते जो इतनी सत्य होती जैसे सेब का पेड़ से गुरुत्वाकर्षण वश गिरना चाहे न्यूटन ने इसे देखा होता या न देखा होता ।
धर्म और ईश्वर
राजनीतिक दृष्टि से तो या कहना सुविधा जनक हो सकता है कि सब धर्मों का एक ही ईश्वर है । परन्तु वास्तविक धरातल पर अपने अपने ईश्वर को याद करने की इतनी भिन्न भिन्न विधियाँ हैं कि अनेकों भगवानों की उत्पत्ति अपने आप ही हो जाती है । किसी एक भगवान का दूसरे भगवान की विधि से पूजा करने को आपराधिक, निंदनीय व धर्म विरुद्ध माना जाता है। व्यक्तिगत भगवान तो हर व्यक्ति हर मत और हर धर्म के अलग होंगे ही होंगे। क्योंकि अल्लाह, गौड और ईश्वर तो अलग अलग वातावरण की उपज हैं। एक अरबी मज़हब तो दूसरा अंग्रेजी रिलिजन और तीसरा संस्कृत धर्म की देन हैं । तीनों अपने अपने वातावरण में भ्रम फ़ैलाने की आवश्यकताओं के अनुसार अस्तित्व में आए हैं । इसीलिए ये तीनों हमेशा आपस में लड़ते ही दिखाई देते हैं । ये तीनों शब्द समानार्थी हो ही नहीं सकते और न ये एक भाव को ही प्रकट करते हैं । ये केवल सुविधा के लिए किए गए अनुवाद हैं।
धर्म और आत्मा
ईश्वर की तरह आत्मा की भी इस पृथ्वी पर विविध कल्पनाएँ प्रचलित हैं । किसी के लिए आत्मा चौरासी लाख योनियों में से गुज़रती है तो किसी के लिए क़यामत के दिन या न्याय के दिन की प्रतीक्षा करती रहती है । कोई इनका वास जड़ चेतन सब वस्तुओं में मानता है तो कोई केवल चेतन में ही इनकी उपस्थिति को स्वीकारता है । किसी के लिए इनका लिंग हमेशा केलिए निश्चित हो जाता है तो किसी के लिए लिंग हर जन्म व जाति के अनुसार बदलता रहता है । किसी के लिए इनके कई प्रकार के हम से बिलकुल अलग संसार हैं और मौज मस्ती के लिए हमारी दुनिया में आते रहते हैं । किसी के अनुसार अच्छी बुरी भूत प्रेतों की आत्माएं हमें सहयता करने या दुःख देने के लिए ही होती हैं । जबकि विरोधी इसे कल्पना मात्र मानते हैं । मतलब ये कि जितने मुंह उतनी बातें पता किसी को नहीं । धर्मांध तो यही सोचते हैं कि तो क्यों नहीं इस भ्रम का ही फायदा उठाया जाए । “पहला भ्रम- अध्यात्म” के अंतर्गत इस भ्रम की उत्पत्ति के विषय में लिखा जा चुका है ।
धर्म और कर्मकांड
सारे धर्मों से इतने कर्मकांड जुड़े हुए हैं कि खान पान, वेश भूषा, भाषा इत्यादि में अनुयायी अपनी विशिष्टता को जतलाने के लिए ही एक जनून की हद तक ले जाते हैं । अधिकतर व्यक्ति इन कर्मकांडों का निर्वाह बिना समझे हुए करते हैं क्योंकि संस्कृत, लैटिन या अरबी उनसे आती ही नहीं है । बस पंडित पादरी या मुल्ला जैसा कहते रहते है वे कर देते हैं या बोल देते हैं । इसके अतिरिक्त अधिकतर इन पाखंडो व क्रिया कर्म का पालन इस लिए भी करते हैं कि कहीं कोई उन्हें नास्तिक न समझ ले । इसमें अपने को आस्तिक समझने की तसल्ली इतनी नहीं होती जितना कि नास्तिक कहलाए जाने का भय । इस भय के कारण नए नए भगवानों की रचना और उनकी पूजा के लिए नए नए कर्मकांड दिनरात किसी के द्वारा भी जोड़ दिए जाते हैं और इसके लिए एकदम अनुयायी भी मिल जाते हैं ।
धर्म और नैतिकता
क्या है नैतिकता ? कौन किसको बहका रहा है ? पहले तो हम अपने आपको भ्रमों का शिकार होने देते हैं । फिर अपना हम नैतिक कर्त्तव्य समझते हैं कि एक समुदाय के रूप में हमें दूसरे ऐसे समुदाय जो हमारी विचारधारा से सहमत नहीं हैं उनको अपनी नैतिकता के मापदंडों को मनवा कर छोड़ें । चाहे इसके लिए हमें क्रुसेड या जिहाद का ही सहारा क्यों न लेना पड़े जहाँ लालच, शोषण और खून खराबा भी जायज़ है । ये प्रयास केवल इस भ्रम के कारण किए जाते हैं कि बहुमत ही सही होता है या जब सभी केवल एक ही मत के हो जाएँगे तो पृथ्वी पर स्वर्ग आ जाएगा । सारे धर्मों ने नैतिकता के ऐसे विरोधी मान दंड बनाए हैं कि साधारण व्यक्ति बौखलाकर, बहुमत से डरकर, या लालच वश अपनी सूझ बूझ खो बैठता है और भेड़ चाल का शिकार हो जाता है । व्यक्तिक रूप से तो आज के अच्छे विचार कल दूषित हो जाते हैं या इसके विपरीत हो जाता है । प्रत्यक्ष है कि केवल असमानता के तार्किक आधार पर ही नैतिकता किसी धर्म की बपौती नहीं हो सकती जैसाकि विभिन्न धर्मों ने ठेका ले रखा है ।
भारतीय परिपेक्ष और धर्म का वैदिक विचार
भारतीय मानस में तो साधारण व्यक्ति द्वारा समझे जाने वाले धर्म के उपर्युक्त चारों अंग इस भयानक रूप से पैठ चुके हैं कि हर व्यक्ति का पाला इनसे पड़ता ही रहता है चाहे वह किसी वर्ग का हो, किसी जाति का हो या आस्तिक हो या नास्तिक । इसका परिणाम यह होता है कि हम रीति रिवाजों, कर्मकांडों को आंख मूंद कर बिना कोई प्रश्न पूछे स्वीकार कर लेते हैं यह सोचकर कि कौन चक्कर में पड़े । हम भौचक्के होकर, असहाय से, भयभीत से उन सारी कुरीतियों को परंपरा मान कर स्वीकार कर लेते हैं जिनका कोई तार्किक व नैतिक औचित्य भी नहीं होता । कई बार हम इस भय से भी ग्रसित रहते हैं कि कहीं कोई हमें नास्तिक न समझ ले या बेमतलब बखेड़ा खड़ा करने वाला न समझ ले । एक तार्किक व वैज्ञानिक दृष्टि कोण को आध्यात्मिक विद्वान तो निकृष्ट ज्ञान मानते ही हैं, विद्या आडम्बरी भी ऐसे में रोटी सेंक लेते हैं । राज्य के वे सारे अंग जो एक ओर तो बूचड़ खाने को प्रश्रय देते हैं तो दूसरी ओर आस्था व विश्वास के नाम पर इन क्रियाओं को पवित्र गाय मानकर इसमें दखल देने से मना कर देते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि या तो हम सबने अफीम खा रखी है या राज्य व धार्मिक समाज ने कोई सांठ गांठ कर रखी है । यह सब उस देश में हो रहा है जो शायद सम्पूर्ण मानवता को वैज्ञानिक दृष्टिकोण में पहल करने का सन्देश दे सकता था जैसाकि वेदों की विषय वस्तु से स्पष्ट है और जिसे अध्यात्म के पंडित भी स्वीकार करते हैं । परन्तु इन पुस्तकों का ऐसा तोड़ मरोड़ कर विश्लेषण हुआ कि कालांतर में हमारे समाज की इकाइयाँ इस बहकावे में जीवित रहने लगी कि हम अध्यात्म में विश्व गुरु हैं नाकि विज्ञान में । इस प्रकार जन साधारण के लिए उपर्युक्त ईश्वर, आत्मा, कर्मकांड व नैतिकता का धर्म के अंगों के रूप में पचार व प्रसार हो गया । हाँ, मेरा कहने का तात्पर्य यही है कि वेदों में धर्म से इन चारों अंगों का कुछ लेना देना नहीं है । जन साधारण को तो इन चारों की एक पुड़िया बना कर धर्म के नाम की घुट्टी पिला दी गई ।
ईश्वर, आत्मा, कर्मकांड व नैतिकता के वैदिक अर्थ
वेद ज्ञान से सम्बंधित पुस्तकें हैं जैसाकि शाब्दिक अर्थ से ज्ञात होता है । इन पुस्तकों की विषय वस्तु है :-
• क्या जानना है
• कैसे जानना है
• कैसे उपयोग करना है

साधारण व्यक्ति के लिए सृजित ईश्वर, आत्मा, कर्मकांड व नैतिकता को उपर्युक्त विषय वस्तु का अंग बनाकर धर्म के रूप में इस प्रकार प्रसारित किया गया है कि यह वेदों की सहमती से वैदिक ज्ञान ही प्रतीत हो । ध्यान आकर्षित करने के लिए केवल लेबल ही वैदिक है, बोतल व भरा हुआ पदार्थ नकली है।
क्या जानना है
इसके अंतर्गत वेदों में दो क्षेत्रों को रेखांकित किया गया है - आत्म ज्ञान व ब्रह्मज्ञान
• आत्म ज्ञान के अंतर्गत अपने विषय में जानने की जिज्ञासा व जो कुछ जाना गया उसका वर्णन है जिसे विकृत करके "आत्मा ज्ञान" में परिवर्तित कर दिया गया जिसका विश्लेषण पहला भ्रम - अध्यात्म और आगे चलकर आवश्यकतानुसार के अंतर्गत किया गया है ।
• ब्रह्म ज्ञान के अंतर्गत सृष्टि व समस्त ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के विषय में जो कुछ जाना गया उसका विवरण है । इसे विकृत करके ब्रह्मा एक व्यक्तिगत ईश्वर की कल्पना में परिवर्तित कर दिया गया जिसका विस्तृत विश्लेषण आगे चल कर इसी लेख के अंतर्गत किया गया है
कैसे जानना है
वेदों के रचयिताओं ने प्रकृति में हर समय की घटनाओं का ध्यान से निरीक्षण किया, निष्कर्ष निकाले व इन पर प्रयोग किए । यही तो हम आज भी करते हैं । उन्हों ने भी ऐसा ही किया और इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को यज्ञ का नाम दिया । वैदिक ज्ञान का यह क्षेत्र क्योंकि जानने की विधियों से सम्बंधित है इसे यज्ञ विधान कहा जा सकता है इसके अंतर्गत उन्हों ने निम्न दो प्रकार के प्रयोगों का अध्ययन किया :
• वे प्रयोग जो प्रकृति में हमेशा होते रहते हैं
• वे प्रयोग जो वेदों के रचियताओं ने किए और मानव को करने चाहियें
उपर्युक्त दोनों विषयों को विकृत करके साधारण व्यक्ति के लिए धर्म के अंतर्गत कर्मकांड में परिवर्तित कर दिया गया । ब्रह्मज्ञान से सम्बंधित विभिन्न तत्त्वों का व प्रकृति में घटित प्रयोगों का निरीक्षण कर वेदों के रचयिताओं को सृष्टि के कुछ नियमों का पता चला जिनसे उन्हें आत्मज्ञान के प्रथम ध्येय के विषय में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां मिली । उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि आत्म और ब्रह्माण्ड का रचना व स्वरूप की दृष्टि से एक निश्चित सम्बन्ध है । दोनों एकसी वस्तु से बने हैं और इसलिए एक से दूसरे को जाना जा सकता है । इसीलिए उन्होंने कहा "यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे" । यज्ञ का अर्थ उन्हों ने वैज्ञानिक प्रयोगों से लगाया चाहे वे प्रकृति में हो रहे हों या मनुष्यों द्वारा उनका अध्ययन किया जा रहा हो । उनका यह निश्चित निष्कर्ष था कि प्रकृति में हर समय प्रयोग चलते रहते हैं और इन प्रयोगों में कुछ निश्चित तत्त्वों का हाथ है । प्रकृति में होने वाले प्रयोगों की उन्हों ने अश्वमेध यज्ञ, पुरुषमेध यज्ञ, सर्वमेध यज्ञ, नरमेध यज्ञ इत्यादि शब्दों से पहचान की । इन शब्दों में मेध घटनाओं का सूचक है जो प्रथम भाग अश्व, पुरुष इत्यादि उर्जा तत्त्वों के कारण होती हैं । अश्व का अर्थ प्रकाश है जोकि एक उर्जा तत्त्व है । इस प्रकार अश्वमेध यज्ञ का कुल मिलाकर अर्थ हुआ " उन प्रयोगों का अध्ययन जो प्रकृति में प्रकाश के कारण हमेशा होते रहते हैं" । और इसी प्रकार अश्विनी कुमार प्रकाश की वे किरणें बन जाती हैं जोकि एक युग्म में हों । परन्तु अश्व और मेध के दूसरे अर्थ घोडा व बलि भी होते हैं जिनके कारण इनके इतने भ्रमात्मक और ऊल जलूल अर्थ फैलाए गए कि अश्विनी कुमार बन गए च्यवन ऋषि के प्रतिद्वंदी और पाश्चात्य विद्वानों ने तो वेदों को गड़रियों के गीत या एक बर्बर सभ्यता की ही पहचान समझा । इसी प्रकार अग्निहोत्र शब्द शायद उन प्रयोगों का द्योतक है जो प्रकृति में अग्नि द्वारा या मानव द्वारा अग्नि से सम्बंधित हों । हो सकता है वैदिक ऋषियों ने इन्हीं प्रयोगों को हवन, होम, तप की संज्ञा से संबोधित किया हो जिसमें अग्नि पर आधारित प्रयोग किए गए थे जिसका विकृत रूप आज हम एक कर्मकांड में देखते हैं । मंदिरों के निर्माण व उनमें पूजा की संस्कृति के आगमन से पहले हवन के प्रचलन के ही तो विकृत कर्मकांडों के रूप में भारतीय इतिहास में साक्ष्य मिलते हैं । वेदों में इस तथ्य के प्रमाण भरे पड़े हैं जिनसे सिद्ध होता है कि रचयिताओं ने स्वयं भी बहुत से प्रयोग किए होंगे जिनसे उन्होंने अत्यंत वैज्ञानिक निष्कर्ष निकाले । उन्होंने अक्षुणता, पूर्णता, कारण व प्रभाव, भविष्य वाणी, शब्द, ध्वनि, क्रमात्मक तर्क, प्रतिपक्ष तर्क, अकस्मात खोज, प्रज्ञा, अस्तित्व और संगठन, सांख्य, अनुमान, गणित, व्याकरण, ज्योतिर्विज्ञान, न्याय, वैश्वीकरण, ज्ञान आधारित अर्थ व्यवस्था इत्यादि के सिद्धांतों की परिभाषा व व्याख्या की । किसी भी कार्य को करने की योग की दोषरहित विधि के अंतर्गत परिभाषित तकनीकी शब्दों जैसे धारणा, ध्यान समाधि इत्यादि का तो किसी भी भाषा में कोई अनुवाद ही नहीं है क्योंकि संसार के किसी और दर्शन में इन विचारों का ही नितांत अभाव है । खोज की यह सूचि इतनी लम्बी है कि आश्चर्य तो होता ही है और दया भी आती है उस बुद्धि भ्रष्टता पर जिसने इनको अध्यात्म में बदल दिया । इन सारी खोजों के लिए प्रयुक्त किए गए शब्द इतने बहुअर्थी हैं कि भ्रम होना स्वाभाविक भी है। इसका मुख्य कारण यह भी है कि इन शब्दों को एक अत्यंत परिमार्जित और विकसित भाषा संस्कृत से लिया गया है। अंग्रेजी भाषा के तो कुछ गिने चुने अलंकार ही हैं जबकि संस्कृत के रस, अलंकार और छंदों पर ही पुस्तकें भरी जा सकती हैं । आवश्यकता तो थी शब्दों के सही वैज्ञानिक अर्थ ढूंढने की और ढूंढ़ लिए गए कर्मकांड के विविध तरीके । ऐसा नहीं है कि इस दिशा में बिलकुल प्रयास नहीं हुए । वेदांग में निरुक्त के अंतर्गत यास्काचार्य की यह स्वीकारोक्ति बहुत कुछ कह जाती है कि "वह वेदों में चार सौ शब्दों के अर्थ ही नहीं जान पाया" । यज्ञ एक वैज्ञानिक शब्द जो प्रयोगों का पर्यायवाची था इस प्रकार यज्ञ कर्म में बदल गया जो कर्मकांड के रूप में अर्थहीन तो हैं ही हास्यास्पद भी हैं ।
कैसे उपयोग करना है
वैदिक ज्ञान का यह वह भाग है जो व्यवहारिक नैतिकता से सम्बन्ध रखता है । वेदों में इस सन्दर्भ में धर्म शब्द का प्रयोग हुआ है परन्तु वैदिक शब्द धर्म का वह अर्थ बिलकुल भी नहीं है जो साधारण व्यक्ति समझता है या जैसा उसे समझाया गया है । ऐसा प्रतीत होता है कि यह शब्द तो वेदों से उठा लिया गया है परन्तु इसमें मनघडंत धर्मों द्वारा बनाए गए मनघडंत नैतिक मूल्य भर दिए गए हैं । इस प्रकार वेदों द्वारा दर्शाई गई व्यवहारिक नैतिकता को विभिन्न धर्मों की विरोधाभासी धार्मिक नैतिकता में बदल दिया गया है । ऐसा करने से साधारण व्यक्ति को सरलता से बहका लिया गया क्योंकि उसे समझा लिया गया कि बताए गए मूल्य वेदों पर ही आधारित हैं। कालांतर में ये मूल्य जो पहले से ही अवैदिक थे इतने भ्रष्ट हो गए कि इन्हें अनैतिकता के अंतर्गत रखना ही अधिक उपयुक्त है । परन्तु धर्म के भ्रम ने साधारण मनुष्य की आँखों पर ऐसा पर्दा डाल रखा है कि वह नैतिकता और अनैतिकता में भेद करने भी अक्षम हो गया है । उसके लिए वही नैतिक बन गया है जो उसके धर्म ने उसके ऊपर थोप दिया है । ये मूल्य और भी लुभावने हो जाते हैं जब किसी भी अनैतिक कार्य को दान धर्म से पश्चाताप करके उपाय के रूप में धार्मिक छूट देदी गई हो ।
वेदों की व्यवहारिक नैतिकता
वेदों में धर्म शब्द का प्रयोग निम्नलिखित दो अर्थों में हुआ है
• कर्त्तव्य
• गुण
क्या जानना है और कैसे जानना है के पश्चात् वेद के रचयिताओं के लिए यह आवश्यक हो गया कि वे इस प्रकार अर्जित ज्ञान को मानव किस प्रकार सर्व जन हिताय और सर्व जन सुखाय के लिए उपयोग करे । इसके लिए आवश्यक था कि वे ऐसे नियमों की व्याख्या करें जो सार्वभौमिकता के सिद्धांत पर खरे उतरें । धर्म शब्द की इस प्रकार रचना हुई जो मूलतः आत्म अनुशाषण पर आधारित था और जिसका अर्थ उन्होंने कर्त्तव्य के रूप में व्याख्यातित किया । आत्म ज्ञान के अंतर्गत उन्हें यह तो मालूम हो चुका था कि मानव की उत्पत्ति में उन्हीं तत्त्वों का हाथ है जिनसे ब्रह्माण्ड की हर रचना हुई है । उनका यह निश्चित निष्कर्ष था कि मानव रचना में प्रयुक्त तत्त्वों के गुण भी अतः मानव में अवश्य होने चाहियें । धर्म का दूसरा प्रयोग इसलिए वेदों में गुणों के अर्थ में हुआ जैसे वायु, अग्नि आदि के गुण ।
धर्म की कर्त्तव्य रूप में व्याख्या
धर्म को कर्त्तव्य के रूप में समझाने के लिए आवश्यक था कि सम्पूर्ण मानवता इसकी परिधि में आए । आज यह एक असंभव सा दिखने वाला कार्य लगता है क्योंकि मानव ने अभी ऐसे समाज की तो कल्पना की है जहाँ अधिकारों के लिए संघर्ष करना तो सभ्यता के विकास का सोपान समझा जाता है परन्तु हर व्यक्ति को अपने कर्तव्यों के लिए प्रेरित करना या आभास भी दिलाना केवल कुछ चुने हुए व्यक्तियों के लिए ही एक महान दायित्व समझा जाता है । दूसरी ओर वेद जिस किसी भी सभ्यता ने लिखे उनमें निहित विचारों से तो ऐसा प्रतीत होता है कि या तो अधिकार शब्द से ही वे अपरिचित थे क्योंकि उन्हों ने अधिकार शब्द का कहीं प्रयोग ही नहीं किया है। या वे इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके थे कि अधिकारों के लिए संघर्ष करना तो एक बर्बरता अथवा आदिम स्थिति के तर्क की पहचान है । हम अधिकारों की बात इसलिए करते हैं कि हमने मानव समाज को ऊंच नीच, अमीर गरीब, गोरा काला, जात पांत, बुद्धिमान मूर्ख, शाषक शषित, विकसित अविकसित, मेरा तेरा, सुखी दुखी, अच्छा बुरा इत्यादि वर्गों में विभाजित कर रखा है । हम यह समझ ही नहीं सकते कि वेदों के अनुसार तो मानवों का किसी भी प्रकार का वर्गीकरण ही मानव स्वभाव की एक प्रकार की अविद्या अर्थात भूल है । इसी लिए उन्होंने मानव समाज का ऐसा कोई वर्गीकरण ही नहीं किया और मानव की उन प्राकृतिक दशाओं का ही अध्ययन किया जिनमें से प्रत्येक मानव को चाहे अनचाहे गुजरना ही पड़ेगा । इन अवस्थाओं को उन्होंने वर्ण व आश्रम का नाम दिया । ये वे नैसर्गिक अवस्थाएँ हैं जिनमें मानव अपनी नैसर्गिक जिज्ञासा "क्या जानना है", "कैसे जानना है" व "कैसे प्रयोग करना है" की क्रियाओं में लिप्त रहेगा ही रहेगा । वेदों ने केवल यह किया कि जब लिप्त रहना ही नियति है तो इस लिप्तता को दोष रहित बनाने के लिए दोनों अवस्थाओं में कर्तव्यों को सूचीबद्ध कर दिया और कर्त्तव्य को ही धर्म का पर्यायवाची बना दिया । इस प्रयास में पहली बार मानव ने न केवल ज्ञान आधारित अर्थ व्यवस्था को ही जन्म दिया अपितु एक ऐसे कर्त्तव्य निष्ठ समाज की भी स्थापना कर दी जहाँ सबको अधिकार स्वयं ही प्राप्त हो गए । या इनके विषय में किसी को सोचने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी । कैसे किया यह ?
वेदों के अनुसार वर्ण व आश्रम का विश्लेषण
ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के अनुसार:
• वर्ण चार हैं – ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र । ये चारों वर्ण ज्ञान के क्रमशः विद्या , सुरक्षा, वित्त व सुविधाओं के प्रतीक हैं ।
• यह कोई मानव जाति का विभाजन या वर्गीकरण नहीं है। क्योंकि विभाजन के मापदंडों से मानवता का अध्ययन करना मानव की एक दोषपूर्ण अवस्था का लक्षण है जिसे वेदों में अविद्या कहा गया है ।
• इसमें वरीयता का कोई सन्देश नहीं है। क्योंकि ज्ञान उच्च व निकृष्ट नहीं होता ।
• वर्ण शब्द का प्रयोग एक सटीक तुलनात्मक प्रतीक के रूप में किया गया है जहाँ इसके एक अर्थ 'रंग' को ज्ञान की बहुरंगीय छटा के सुंदर रूप में दर्शाने का प्रयत्न किया गया है ।
• ये तो ज्ञान की वे चार अवस्थाएँ या चार रंग हैं जिनके अतिरिक्त ज्ञान का किसी और ढंग से प्रकटीकरण हो ही नहीं सकता । इनके अतिरिक्त ज्ञान किसी और रूप में अस्तित्त्व में आ ही नहीं सकता ।
• मानव द्वारा अर्जित ज्ञान केवल इन्हीं चार प्रकार से उपयोग में लाया जा सकता है । यह उपयोग शौक, व्यवसाय, जीविका और एक आवश्यकता के रूप में किया जा सकता है
• हर मानव में हर समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र रूप में ज्ञान को उपयोग करने की क्षमताएँ उपस्थित रहती हैं और वह इनका आवश्यकतानुसार समय समय पर उपयोग करता रहता है ।
ज्ञान का उपयोग करने के लिए हर मानव आयु की चार अवस्थाओं में से गुज़रता है इसी यथार्थ को वेदों ने आश्रम का नाम दिया । यजुर्वेद के अनुसार :
• आश्रम चार हैं – ब्रह्मचर्य , गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास ।
• आश्रम एक नैसर्गिक प्रक्रिया है । जीवन की प्रक्रिया आयु से मापी जाती है । और यदि यह सौ वर्ष हो तो हर मानव को इन पच्चीस पच्चीस वर्ष के आश्रमों से गुजरने की एक नैसर्गिक प्रक्रिया माना जा सकता है । इनमें अपवाद लिंग, देश, काल, उद्देश्य इत्यादि के कारणों से वैध व उचित सिद्ध करने के हर मानव निर्मित धर्म ने प्रयत्न किए है। पर इन्हें अप्राकृतिक या प्रकृति विरुद्ध तो कहा ही जाएगा।
• आश्रम एक ज्ञान आधारित अर्थ व्यवस्था है । ब्रह्मचर्य आश्रम में हर मानव के लिए केवल ज्ञान अर्जित करने के कर्त्तव्य का विधान है जिसका उपयोग गृहस्थ व वानप्रस्थ आश्रमों में करना फिर एक नैसर्गिक प्रक्रिया है जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्णों के रूप में ही हो सकती है । आज के व्यापर व उद्योग प्रबंधन का गुरु मंत्र knowledge based economy तो अभी शैशवास्था में ही है ।
• ब्रह्मचर्य, गृहस्थ तथा वानप्रस्थ ये तीन ऐसे आश्रम हैं कि इन में मानव केवल आत्मोन्नति के लिए ही अर्जित ज्ञान का उपयोग करता है । वानप्रस्थ आश्रम में उसका कर्त्तव्य है कि अर्जित व संचित ज्ञान का अपने ही बच्चों की सहायता करने में उपयोग करे क्योंकि अब उसके बच्चे गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर रहे हैं और वह उनके बहुत समय को नष्ट होने से बचा सकता है जो उसने परीक्षण व त्रुटि में व्यतीत किया था । इसके अतिरिक्त इस आश्रम में ही उसका यह मुख्य कर्त्तव्य है कि वह अपने को अगले आश्रम सन्यास के लिए तैयार कर सके । मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह विचार कितना गूढ़ व व्यवहारिक है कि इसका अनुमान तो इसी से लगाया जा सकता है कि जीवन के तीन चौथाई भाग 75 वर्ष तो स्वार्थ साधन में लगा कर ही मानव स्वार्थ की निस्सारता व आत्म की पहचान की ओर बढ़ सकता है ।
• सन्यास आश्रम में मानव का कर्त्तव्य है कि वानप्रस्थ में उत्पन्न की गई क्षमताओं से अर्जित व संचित ज्ञान को सारे संसार के काम के लिए प्रस्तुत करदे । सन्यास आश्रम तक पहुँचते पहुँचते ब्रह्मचर्य आश्रम का अर्जित ज्ञान अनुभव के कारण इतने गुना हो जाता है कि मानवता को इससे अछूता रखना तो मूर्खता ही होगी । इसलिए सन्यासी इसका उपयोग ब्राह्मण रूप में ही कर सकता है जहाँ उसका यह धर्म है कि अर्जित ज्ञान को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ व वानप्रस्थ की स्वार्थ भावनाओं के विपरीत निस्वार्थ वसुधैव कुटुम्बकम भाव से सबमें बाँट दे ताकि ज्ञान का प्रसार निर्बाध व निर्दोष रूप से चलता रहे । आज का ग्लोबलाइज़ेशन का सिद्धांत तो स्वार्थ वश शोषण के शिकंजे फ़ैलाने की ही ओर अधिक उन्मुख है ।
• सन्यासी का वर्ण ब्राह्मण है । निस्वार्थ वसुधैव कुटुम्बकम का अर्थ अपने कुटुंब को छोड़ कर जंगल में जा बसने से नहीं है । इस का अर्थ एक सीमित कुटुंब की स्वार्थ भावना से निकल कर एक विस्तृत कुटुंब को अर्जित ज्ञान प्रदान करना है जो निस्वार्थ भावना से ही संभव हो सकता है । यही एक ब्राह्मण का धर्म है ।
वर्ण व आश्रम के धर्म
आज भारतीय मानस को यह समझाना कि मानवता ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र नामों से संबोधित की जाने वाली जातियों में विभाजित नहीं है इतना ही मुश्किल है जितना पाश्चात्य समाज को यह समझाना कि मानवता छोटे बड़े, गरीब अमीर व रंगीन वर्गों में विभाजित नहीं है। इन मानसिकताओं के लिए अध्यात्म द्वारा प्रसारित धर्मों का ही योगदान मुख्य है । दोनों को ही अपना यह विभाजन सहज, सरल और सत्य प्रतीत होता है। भारतीय मानसिकता में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र शब्द वर्ण के प्रकार के रूप में ऋग्वेद के पुरुष सूक्त से लिए गए हैं । अध्यात्मवादी इसी कारण वर्ण के इन विश्लेषणों में कोई विकृति ही नहीं देखते और इस विभाजन को वैदिक धर्म संगत बता कर इस प्रकार प्रसार किया गया कि जन साधारण यह भी मानने को तैयार नहीं है कि वैदिक धर्म नाम की स्थापना करने का वेदों में न तो कोई हठ है, न कोई उद्देश्य और न ही कोई प्रयास है । उन्होंने तो धर्म का अर्थ केवल कर्त्तव्य बताया है जिसके अनुसार हर व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वह अर्जित ज्ञान का उपयोग केवल इन्हीं चार वर्ण - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के अनुरूप ही करे । वैदिक ऋषियों का यह निश्चित मत था कि ज्ञान का उपयोग केवल इन्हीं चार रूपों में संभव हो सकता है जिनको वर्ण के नाम से जाना जाता है और हर व्यक्ति में ये चारों वर्ण हमेशा उपस्थित रहते हैं । यदि ज्ञान के उपयोग की चार ही संभावनाएं हैं और हर व्यक्ति में ये उपस्थित हैं तो वह स्वतः ही यह कार्य करेगा । वेदों में यह कर्त्तव्य को थोपने की क्या आवश्यकता पड़ गई । बस यही वेदों में वर्णित व्यवहारिक नैतिकता है । उनके अनुसार व्यवहार में नैतिकता तभी आ सकती है जब हर कोई हर समय अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए तत्पर हो । इसके लिए आवश्यक है कि कर्तव्यों की पूरी सूचि उसके सम्मुख हो । ठीक यही वेदों के रचयिताओं ने किया । वेदों में कर्तव्यों की श्रंखला इतनी विस्तृत है कि समस्त मानव जाति में इस से कोई अछूता नहीं बचा है । वर्ण व आश्रम के अंतर्गत कर्तव्यों में विभिन्न विद्वानों द्वारा विस्तृत व्याख्याएँ हुई हैं जिनमें विद्यार्थी, शिक्षक, पति, पत्नी, बच्चे, पुत्र, पुत्री, माता, पिता, अतिथि, स्वागत करता, शाषक, शाषित, मालिक, नौकर, कार्यकारिणी, न्याय पालिका इत्यादि सबको संबोधित किया गया है । ये व्याख्याएँ व्यकिगत विकृत विचार भी हो सकते हैं जिनसे वर्ण व आश्रम के विषय में विभिन्न भ्रमों की उत्पत्ति व पोषण ठीक उसी प्रकार हुआ जैसे वेदों से उद्धृत धर्म शब्द के साथ हुआ । इससे वेदों में वर्णित वर्ण व आश्रम के सिद्धांतों व इनमें निहित कर्त्तव्य भावना के साथ कोई दोष नहीं निकाला जा सकता । उन्होने प्रत्येक वर्ण व आश्रम के धर्म अर्थात कर्तव्यों को परिभाषित कर दिया । उनके अनुसार:
• ब्राह्मण वर्ण का धर्म - ब्रह्मचर्य आश्रम में अर्जित ज्ञान को आगे फैलाना व इसमें निरंतर वृद्धि करना ही ब्राह्मण का कर्त्तव्य है । यह ज्ञान की पहली आवश्यकता है कि ज्ञान का उपयोग ज्ञान के लिए ही किया जाए । इसके लिए हर व्यक्ति का ज्ञान का संरक्षण व संवर्धन ही मुख्य धर्म हो जाता है। इतना अथाह समुद्र है ज्ञान का कि एक ओर तो जो कुछ जाना जा चुका है उसका ठीक ठीक संकलन किया जाए और दूसरी ओर आगे जानने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएँ । हम इस दायित्व को माता, पिता, अतिथि व मित्र इत्यादि के रूपों में पूरा करते रहते हैं । वेदों का केवल इतना निर्देश है कि हम इस धर्म का निष्ठा पूर्वक ऐसे निर्वाह करें कि उस ज्ञान का प्रसार व प्रचार हो जो विद्या व अविद्या के भेद को समझने में सक्षम है । व्यक्तिगत दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति ब्राह्मण का ही कर्त्तव्य निभा रहा होता है जब वह अपने अर्जित ज्ञान के आधार पर बच्चों को, मित्रों को शिक्षा, सलाह इत्यादि देता है या समाज का किसी भी क्षेत्र में मार्ग दर्शन कर रहा होता है । सामाजिक दृष्टि से ब्राह्मण का धर्म वही निभा सकता है जो वित्तेष्णा से किसी भी अवस्था में ग्रसित नहीं होने की क्षमता रखता हो । दूसरे शब्दों में ज्ञान के प्रसार के धर्म को पूरा करने के लिए ब्राह्मण में कोई लालच या कोई व्यापारिक व्यवसाय की भावना नहीं होनी चाहिए । उसमें 'विद्या दान महा दान' का दंभ भी नहीं होना चाहिए क्योंकि यह भी कालांतर में परलोक सुधारने या आत्म श्लाघा के विकृत विचारों वश किसी लालच का ही संकेत है । आज के सन्दर्भ में ब्राह्मण के धर्म के इस विचार को समझना असंभव ही है क्योंकि शिक्षा तो एक व्यवसाय बन चुका है और दान तो व्यक्तिक धर्मों द्वारा इतना महिमा मंडित विचार बना दिया गया है कि इसमें छुपी हुई आत्म श्लाघा, शोषण द्वारा उत्पन्न सामाजिक असमानता, अपराध भावना पर पर्दा डालने या मुक्ति का प्रयास व लालच जैसी विकृतियों को देखा ही नहीं जा सकता ।
• क्षत्रिय वर्ण का धर्म – ब्रह्मचर्य आश्रम में अर्जित ज्ञान का उपयोग अपनी सुरक्षात्मक शक्तियों को बढ़ाने के कर्तव्यों का पालन करना क्षत्रिय वर्ण का धर्म है । व्यक्तिगत दृष्टि से हर व्यक्ति क्षत्रिय का कर्त्तव्य निभाता है जब वह अपनी, अपने परिवार, अपने प्रिय जनों की सुरक्षा के लिए तत्पर रहता है या अकस्मात आई आपदाओं में सब की सुरक्षा के लिए स्वतः ही कदम उठाता है । सामाजिक दृष्टि से एक क्षत्रिय का धर्म सैनिक व शाषक के रूप में वर्णित हैं । ब्राह्मण की भांति क्षत्रिय के इन धर्मों को भी वही निभा सकता है जो वित्तेष्णा से ग्रसित नहीं हो । दूसरे शब्दों में सैनिक व एक शाषक के धर्म को पूरा करने के लिए क्षत्रिय में कोई लालच या कोई व्यापारिक व्यवसाय की भावना नहीं होनी चाहिए ।
• वैश्य वर्ण का धर्म – ब्रह्मचर्य आश्रम में अर्जित ज्ञान का उपयोग अपनी वित्त की क्षमताओं को बढ़ाने के कर्तव्यों का पालन करना वैश्य वर्ण का धर्म है । व्यक्तिगत दृष्टि से हर व्यक्ति वैश्य का कर्त्तव्य निभाता है जब वह अपने परिवार के भरण पोषण के लिए वित्तीय व्यवस्था करता है और अपने वित्तीय साधनों में बढ़ोतरी के विषय में योजनाएं बनाता है। सामाजिक दृष्टि से वित्तीय प्रबंधन ही वैश्य का मुख्य धर्म है । सारे कर्त्तव्य भी वित्त आधारित ही हैं जिनका एक ही लक्ष्य है कि वित्तीय क्षमताओं को जितना बढाया जा सके बढाया जाए। तो इस धर्म को ब्राह्मण व क्षत्रिय वर्ण के धर्मों के समान वित्तेष्णा रहित तो नहीं माना जा सकता । परन्तु यह वित्तेष्णा लालच, लोलुपता रहित तो हो सकती है । वेदों के अनुसार तो यह तृष्णा मुक्त व्यवहार ही है जो वैदिक व्यवहारिक नैतिकता और योग विधि की रीढ़ की हड्डी है । वित्तेष्णा को वेदों में इस प्रकार मानव की एक प्राकृतिक आवश्यकता के रूप में स्वीकारा गया है और लोलुपता को एक दोष ।
• शूद्र वर्ण का धर्म - ब्रह्मचर्य आश्रम में अर्जित ज्ञान का उपयोग अपनी सुविधाएँ उत्पन्न करने की, प्रदान करने की क्षमताओं को बढ़ाने के कर्तव्यों का पालन करना शूद्र वर्ण का धर्म है । व्यक्तिगत दृष्टि से हर व्यक्ति शूद्र का कर्त्तव्य निभाता है जब वह अपने परिवार के पोषण के लिए भौतिक सुविधाओं की व्यवस्था करता है और अपने सुविधा साधनों में बढ़ोतरी के विषय में योजनाएं बनाता है । सामाजिक दृष्टि से सारे समाज के काम आने वाली नई नई सुविधाओं का उत्पादन ही शूद्र का धर्म है। यही उसका व्यवसाय है और यही उसका भरण पोषण का साधन है। प्रत्यक्ष है कि यह भी वैश्य धर्म के समान वित्तेष्णा पर ही आधारित लक्ष्य है। कोई भी सुविधा सामाजिक दृष्टि से निरंतर उपयोगी और इसकी पूर्ति तभी हो सकती है जब यह ज्ञान के निश्चित चार मानकों खोज, सुरक्षा, प्रसारण व उत्पादन पर खरी उतरती हो। इसकी खोज एक ब्राह्मण का कर्त्तव्य है, इसकी सुरक्षा के सारे पहलु एक क्षत्रिय का कर्त्तव्य है, प्रसारण अर्थात सबको उपलब्ध कराना वैश्य का कर्त्तव्य है और उत्पादन शूद्र का कर्त्तव्य है। इन क्रियाओं में तुलनात्मक वरीयता या श्रेष्ठता ढूँढना तो मंद बुद्धि का ही परिचायक है । इनमें कोई भी कर्त्तव्य ऐसा नहीं है जिसमें प्रबंधन के नियम लागू न होते हों । फिर भी आज के समाज में वित्तीय प्रबंधन का ही बोलबाला है ।
जीविका के रूप में वर्ण और आश्रम
उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि ब्रह्मचर्य आश्रम में अर्जित ज्ञान का उपयोग हर मानव अगले गृहस्थ आश्रम में जीविका उपार्जन के लिए ही करेगा । इसके लिए स्वाभाविक है कि हर स्नातक को कोई भी वर्ण चुनने की स्वतंत्रता हो । जीविका के लिए वित्त की आवश्यकता है । वैश्य एवं शूद्र वर्ण ही ऐसे थे जिन में वित्तेष्णा आधारित व्यवसायों की स्वतंत्रता थी। इसीलिए बहुमत वैश्य और शूद्र वर्णों के व्यवसायों को ही चुनता होगा । ब्राह्मण व क्षत्रिय वर्णों के धर्म में वित्तेष्णा की अनुपस्थिति ही पहली अनिवार्य शर्त है । इसलिए सामाजिक व्यवस्था में इनके चयन की अत्यंत कठिन प्रक्रिया रही होगी । इनकी वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति समाज का उत्तरदायित्व रहा होगा और समाज में इनको अत्यंत आदरणीय स्थान प्राप्त रहा होगा । इतिहास में इसके प्रमाण तो मिलते हैं कि गुरु को एक आदरणीय स्थान भारतीय जन मानस में रहा है । परन्तु इतिहास में ऐसे उदहारण भी भरे पड़े हैं जहाँ इस आदरणीय स्थान को वैदिक ब्राह्मण वर्ण की एक विकृत व्याख्या 'ब्राह्मण जाति' के लिए ही शरारतपूर्ण ढंग से प्राप्त करने के निंदनीय प्रयास किए गए हैं । इसमें कठिन चयन प्रक्रिया की कोई आवश्यकता ही नहीं रही क्योंकि ब्राह्मण वर्ण को ब्राह्मण जाति में परिवर्तित कर दिया गया । ब्राह्मण जाति के रूप में वित्तेष्णा रहित होने के कहीं कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते । ब्राह्मण वर्ण से अपेक्षित कर्त्तव्य – ज्ञान की खोज, नियोजन व प्रसार कहीं खो ही गए । इसके विपरीत इसी कर्त्तव्य के नाम पर बिना कोई कार्य किए कर्म कांडों को ही भौंडे ढंग से प्रसारित कर दान को ऐसे महिमा मंडित किया गया कि जन साधारण व विशिष्ट सब इस जाति विशेष की वित्तेष्णा को ही बिना मांगे ही पूरी करने में एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा में लग गए । क्षत्रिय वर्ण भी एक जाति में परिवर्तित कर दिया गया । एक सैनिक को एक ओर तो वित्तेष्णा रहित होने का कर्त्तव्य बोध तो बार बार हर इतिहास में कराया गया पर दूसरी ओर उसकी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के कर्त्तव्य के लिए राज्य व समाज की भूमिका संदिग्धता में घिरी रही । इस सन्दर्भ में चाणक्य द्वारा चन्द्रगुप्त को लिखे गए पत्र के कुछ अंश उल्लेखनीय हैं क्योंकि ये भी क्षत्रिय वर्ण के वित्तेष्णा रहित वैदिक विचार की ही पुष्टि करते हैं – “जब राज्य के नागरिक राज्य की उन्नति व विकास के कार्यों में रत रहते हैं तब एक मौर्य सैनिक सब के मन में यह विश्वास सुनिश्चित व सुदृढ़ करता है कि राज्य के नागरिक उसके कारण अपने अपने कार्यों में निर्बाध लगे रहेंगे । इस व्यक्ति के हे राजन ! आप ऋणी हैं उस विश्वास के लिए जो हमारी राष्ट्रीय अस्मिता की एक अनिवार्य पहचान है । इसलिए स्वप्रेरणा से ही आप यह पूरी संवेदनशीलता से सुनिश्चित करें कि एक सैनिक के हर विधिसम्मत ऋण को आप चुकाएं । आप सुनिश्चित करें कि उस की हर आवश्यकता, हर इच्छा समाज से उसके प्रति सम्मान की अपेक्षा सहित, सबकुछ समय से पहले ही उसे मिल जाए । क्योंकि इसकी कोई सम्भावना नहीं है कि वह इनकी कभी अपने आप मांग करेगा”। वैश्य व शूद्र वर्णों को भी जातियों में बदल दिया गया । कालांतर में इन जातियों में वरीयता के क्र म के विचार का इस प्रकार प्रतिरोपण हुआ कि हर जाति में भी उच्च व नीच प्रकार के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र उत्पन्न हो गए । अपने से नीचे के क्रम को हेय समझने की मानसिकता ने छूत अछूत के ऐसे घिनौने विचारों को जन्म दिया जिनकी तुलना पश्चिम के रंग व अर्थ आधारित भेद भाव भरे विचारों से की जा सकती है । प्रत्येक आक्रान्ता व देसी शाषक ने इस विभाजन का खुलकर अपने स्वार्थ साधन के लिए प्रयोग किया । ठीक ऐसा ही उल्टा पुल्टा विश्लेषण वैदिक विचार आश्रम के साथ किया गया प्रतीत होता है । इससे वर्ण व आश्रम दोनों में निहित कर्तव्य की मुख्य भावना लगभग समाप्त ही हो गई और कर्त्तव्य की जगह अधिकार व विभाजन की घातक दुर्व्यवस्था ने लेली । विडंबना यह कि इस विश्लेषण को वेदोचित बताकर प्रचार किया गया । ऐतिहासिक दृष्टि से ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता जहाँ किसी भी काल में वेदों के वर्ण व आश्रम के कर्त्तव्य प्रधान विचार को लागू करने का कोई प्रयत्न भी किया गया हो । इसके कारण विश्लेषण की कमी इतनी नहीं है जितनी की जान बूझ कर एक विकृति की दिशा में ही किए गए प्रयास हैं जिनकी पुष्टि इतिहास में बार बार होती है । वर्ण व आश्रम अलग अलग वेदों में वर्णित विचार हैं जोकि वेदों की एक विषयवस्तु व्यवहारिक नैतिकता के प्रतीक हैं । उन को जोड़ कर वर्णाश्रम शब्द की रचना कर दी गई । इस प्रकार आज की जाति प्रथा को भी वेदों के ही विचार वर्णाश्रम द्वारा मान्यता प्राप्त विचार बता कर इसे धर्म के अंतर्गत धार्मिक नैतिकता का एक अभिन्न अंग बनाकर प्रसारित किया जाता है ।
वर्ण और आश्रम पर आधारित एक कर्तव्यनिष्ठ समाज की स्थापना
वर्ण व आश्रम के वैदिक विचारों को इतने दूषित एवं विकृत ढंग से प्रचारित व प्रसारित किया गया है कि यह कल्पना करना भी अब असंभव सा लगता है कि ये विचार एक ऐसे कर्त्तव्य निष्ठ समाज की उपस्थिति के द्योतक हैं जिसमें राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक व्यवस्थाएं एक अत्यंत नैसर्गिक व वैज्ञानिक प्रक्रिया पर आधारित हैं। इनमें आज की भांति विभिन्न बनावटी, विरोधाभासी व दिन प्रतिदिन असफल होने वाली व्यवस्थाओं की कोई संभावना ही नहीं है। विकृति की यह प्रक्रिया संभवतः उसी काल में प्रारंभ हो गई थी जब उपनिषद, ब्राह्मण, मनुस्मृति इत्यादि वे ग्रन्थ लिखे जा रहे थे जो वेदों की विषयवस्तु की व्याख्या के नाम पर विभिन्न भ्रमों को प्रसारित कर रहे थे जिसका संकेत व आंशिक वर्णन पहला भ्रम - अध्यात्म के अंतर्गत किया जा चुका है। सच्चाई तो यह है कि वर्ण व आश्रम के वैदिक विचारों की वैज्ञानिकता को कभी परखा ही नहीं गया। किसी भी युग में ब्रह्मचर्य व सन्यास आश्रमों में निहित ज्ञान व शिक्षा के योगदान को महत्वपूर्ण मानकर सामाजिक दायित्व समझा ही नहीं गया। अपितु इन्हें दान व दया की मनघडंत उच्चता का पात्र बनाकर रख दिया जिसका परिणाम आज शिक्षा व काल्पनिक आस्था का घृणित व्यवसायीकरण है। इसी प्रकार ब्राह्मण व क्षत्रिय वर्णों में निहित ज्ञानोत्पन्न शाषक बल व क्षमता को भी कभी सामाजिक दायित्व नहीं माना गया। इसका परिणाम आज का भ्रष्ट तंत्र है जिसका कोई विकल्प नहीं है क्योंकि विकल्प बनाने वाले स्वयं सिर से पैर तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। वेदों में वर्णित वर्ण व आश्रम के धर्मों पर ही आधारित कर्त्तव्य निष्ठ समाज कोरी कल्पना नहीं हो सकता। ऐसा समाज अवश्य रहा होगा जिसमें ज्ञान आधारित अर्थ व्यवस्था हो , जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता आधारित सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था हो, जहाँ कर्त्तव्य प्रधान अधिकार शून्य न्यायिक व्यवस्था हो जिसके कारण अधिकार स्वतः ही प्राप्त हो जाते हों। यह सब उस मूलभूत सिद्धांत के पालन के कारण संभव हुआ होगा जहाँ शिक्षा को नैसर्गिक आवश्यकता मानकर इसकी प्राप्ति को वर्ण व आश्रम के प्राकृतिक सोपानों के कर्तव्यों में बाँट दिया गया होगा। ऐसे समाज की उपस्थिति का सब से बड़ा प्रमाण तो वेदों में उपर्युक्त विचारों की विद्यमानता ही है जिनके प्रयोग के विषय में आज तक के मानव समाज ने आधे अधूरे, छिटपुट या नासमझी से ओतप्रोत भ्रमात्मक प्रयत्न ही किए हैं । क्योंकि वेदों की शास्त्रीय भाषा की परिपक्वता व तकनीकी शब्दों को ही समझने में हम असमर्थ रहे हैं। अपने को उन्नत कहने वाला आज का मानव समाज इन वैदिक विचारों के कहीं आस पास भी नहीं आया है क्योंकि वेदों में वर्णित मनोवृति की व्याख्यानुसार इस अवस्था में हमारे लिए यह संभव ही नहीं है। इसीलिए तो हमारी राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक व्यवस्थाएं बार बार चरमरा जाती हैं। हम यह भी भूल जाते हैं कि वेदों की इस भाषा को यह सौष्ठव व पूर्णता प्राप्त करने के लिए ही सभ्यता के हजारों वर्ष लगे होंगे। पता नहीं यह वैदिक युग काल की किस घटना का ग्रास हो गया। यह केवल खोज का विषय हो सकता है।
धर्म का भ्रमात्मक प्रचार व कुछ प्रासंगिक प्रश्न
वैदिक शब्द धर्म अर्थात कर्त्तव्य के विभिन्न भ्रमात्मक अर्थों को प्रसारित करने की एक सुनिश्चित विधि है । क्या है वह विधि ? अब तक के विश्लेषण से यह तो स्पष्ट है कि वैदिक विषयवस्तु “क्या जानना है” में से आत्म व ब्रह्म शब्दों को उठाकर साधारण जन के लिए धर्म के अंतर्गत आत्मा व ब्रह्मा अर्थात भगवान शब्दों की रचना कर दी गई। वेदों की दूसरी विषयवस्तु “कैसे जानना है” के पर्यायवाची यज्ञ शब्द को यज्ञ कर्म में बदल दिया गया और फिर साधारण जन के लिए धर्म के अंतर्गत कर्मकांडों की रचना कर दी गई । वेदों की तीसरी विषय वस्तु “व्यवहारिक नैतिकता”को धार्मिक नैतिकता के नाम पर कर्मकांडों को बिना समझे मानने के लिए आदेशों में परिवर्तित कर दिया । धर्म का क्यों और कैसे भ्रमात्मक प्रचार किया जाता है? क्यों इसको वैदिक अर्थ कर्त्तव्य के रूप में नहीं समझा जाता ? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए निम्नलिखित दो प्रकार के भागों में रखे गए प्रश्नों के उत्तर ढूंढने के प्रयत्न करने होंगे । भ्रम की सबसे सुंदर शरारत यह है कि पहले यह किसी आकर्षक पर असंभव कल्पना को जन्म देता है और फिर पकड़े जाने पर किसी और कल्पना को जन्म दे देता है । इस प्रकार भ्रम असंभव कल्पनाओं का एक भंडार हो जाता है और साधारण जन इसकी भूल भुलैया में फंस कर रह जाता है ।
प्रथम भाग के प्रश्न
• क्या जन साधारण द्वारा समझा जाने वाला धर्म वैदिक शब्द का विकृत रूप है?
• क्या जन साधारण द्वारा धर्म के अंतर्गत समझी जाने वाली आत्मा वैदिक विषयवस्तु आत्मज्ञान की विकृति है?
• क्या जन साधारण द्वारा धर्म के अंतर्गत समझा जाने वाला ईश्वर वैदिक विषयवस्तु ब्रह्मज्ञान की विकृति है?
• क्या जन साधारण द्वारा धर्म के अंतर्गत समझा जाने वाला पूजा पाठ वैदिक विषयवस्तु यज्ञ की विकृति है ?
• क्या जन साधारण द्वारा धर्म के अंतर्गत समझी जाने वाली नैतिकता वैदिक विषयवस्तु व्यावहारिक नैतिकता कर्त्तव्य की विकृति है?
दूसरे भाग के प्रश्न
अब इन प्रश्नों पर ध्यान देने की आवश्यकता है
• क्या जातिप्रथा वैदिक वर्णाश्रम का विकृत रूप है?
• क्या छूत - अछूत कोई समाज का वैदिक वर्गीकरण है?
• क्या विधवा द्वारा अपने मन से या ज़बरदस्ती सती प्रथा का पालन कोई वैदिक धर्म सम्मत है?
• क्या विधवा का सामाजिक बहिष्कार या विशेष वेश भूषा कोई वैदिक आदेश है?
• क्या दहेज़ प्रथा या कन्या पक्ष द्वारा पालन किए जाने वाले क्षुद्र व्यवहार किसी वैदिक धर्म के अंश हैं?
• क्या कन्या व वर पक्ष के संबंधों को ही छोटा बड़ा करके देखना कोई वैदिक धर्म का आदेश है?
• क्या पुत्रेष्णा और इस प्रकार पुत्र द्वारा किए जाने वाले क्रिया कर्म, श्राद्ध कर्म कोई वैदिक धर्म सांगत हैं?
• क्या पुत्री बालक या भ्रूण को नष्ट करना कोई वैदिक धर्म निर्देश है?
• क्या पुत्री को पराया धन समझना कोई वैदिक निर्देश है?
• क्या पुत्री को पराया धन समझ कर उसके साथ भेद भाव के दुर्व्यवहार करना वेद सम्मत हैं?
• क्या बालविवाह और गौना कोई वैदिक धर्म मान्य प्रथाएँ हैं?
• क्या श्राद्ध, तर्पण व ब्रह्म भोज कोई वैदिक धर्म के निर्देश हैं?
• क्या भीक मांगना, विलियम बेंटिक के युग की ठगी प्रथा या आज के दान का महिमा मंडन कोई वेद मान्य उपक्रम हैं?
यह सूचि जितनी लम्बी चाहो बनाई जा सकती है । भ्रम की यही तो सुंदर शरारत है । इन सब दूसरी सूचि के भ्रमों का उत्तर कट्टरपंथी हाँ में ही देते हैं। परन्तु जैसे ही राज्य की ओर से इसके लिए दंड के विधान किए जाते हैं तो सब कट्टर पंथी उड़नछू हो जाते हैं या अर्द्ध कट्टरपंथियों में बदल जाते हैं। जो इन सब भ्रमों की व्याख्या कुछ यूँ करने लगते हैं कि – “वेदों में इसका वास्तविक अर्थ तो यह है”; “साधारण जन को समझाने के लिए या धर्म और ईश्वर का भय उत्पन्न करने के लिए ऐसा किया गया”; “अन्यथा अव्यवस्था फ़ैल जाएगी इत्यादि”- राज्य भी इन अर्द्ध कट्टरपंथियों का साथ देने लगता है । कालांतर में यही अर्द्ध कट्टरपंथी फिर कट्टरपंथियों में बदल जाते हैं और यह क्रम चलता रहता है।
जो मानसिक झुकाव दूसरी सूचि की घृणित क्रियाओं को भी धर्म सम्मत मानने के लिए तत्पर रहता है वह प्रथम सूचि के पवित्र, पावन व पुण्य से ओतप्रोत लगने वाले शब्द धर्म, आत्मा, ईश्वर, कर्मकांड व धार्मिक नैतिकता को भ्रम कैसे मान सकता है ! उससे तो यह आशा करना भी व्यर्थ है पर प्रयत्न करने में तो कोई हर्ज़ नहीं है । केवल इसी लिए कि वर्ण तो विशिष्टताएँ हैं जिनको आश्रमों के विभिन्न कालों में प्राप्त करने का, सुधार करने का और उपयोग करने के विधानों को नकारा नहीं जा सकता ।

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